महिला दिवस विशेष ! - News Beyond The Media House

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Friday, March 8, 2019

महिला दिवस विशेष !

         
आज ८ मार्च के दिन दुनियाभर के देशों में महिला दिवस मनाया जा रहा है। भारत में भी इस विशेष दिवस पर स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों, सोसाईटीयों और अनेक संस्थानों मे महिलाओं को उनके खास अस्तित्व का अहसास दिलाया गया और उनका आदर सत्कार किया गया। विश्व स्तर पर तो यह सब ठिक है किंतु मैं नहीं समझता भारत में इस तरह के किसी पर्व की कोई आवश्यकता है क्योंकी भारत में सृष्टी की रचना के समय से ही सनातन काल से नारी को आदिशक्ती कहा गया है। इसलिए इस तरह के पश्चिमी पर्व को मनाने का अर्थ है की हम महिलाओं को ये अहसास दिलाने का प्रयास कर रहे हैं की समाज तुम्हे समान दर्जे का नहीं मानता और इसलिए इस महिला दिवस के एक विशेष दिन पर हम आपके साथ खडे होकर इसका विरोध करते हैं। यदि विभिन्न देशों से तुलना करें तो इतिहास में पूरी दुनिया में महिलाओं का शोषण किया गया था और यदि समाज, संप्रदाय और धर्म की बात करें तो भी लगभग सभी धर्मों मे महिलाओं को पुरूषों की तुलना मे कमतर दर्जा दिया गया और उनका लिंगभेद के आधार पर शोषण हुआ। किंतु भारतवर्ष में महिलाओं को सनातन काल से ही समान अधिकार दिया गया है और सनातन हिंदु धर्म में स्त्री को आदिशक्ती दुर्गा के रूप में पूजा जाता रहा है। 

          भारत में स्त्रीयों पर अत्याचार व भेदभाव मुगल शासन के बाद से शुरू हुआ। मुसलमानों के भारत में आने से पहले विश्वगुरू भारत की नारी को पुरूषों के समान ही शिक्षा, स्वयंवर, सन्यास व शासन करने का अधिकार प्राप्त था जो कालांतर में मुसलमानों के आगमन के बाद विकृत हो गया। मुगलों के भारत में आक्रमण से पहले भारत में घुँघट प्रथा, सती प्रथा, बालविवाह, लिंगभेद जैसे कुरितियाँ नही थी किंतु मुसलमानों की गिद्ध दृष्टी से अपने घरों की लक्ष्मी स्वरूप माता-बहनों व बेटियों को दुष्ट आक्रमणकारी मुसलमानों से बचाने के लिए हमारे पुर्वजों ने बालविवाह, घुँघट प्रथा, सती प्रथा और महिलाओं पर अन्य पाबंदियाँ लगानी शुरू कर दी। जिस देश की स्त्रियाँ अपनी परिपक्वा आयु में अपनी स्वयं की इच्छानुसार पति को चुनकर स्वयंवर रचाती थी, उसी देश में आक्रमणकारी मुसलमानों के आने के बाद से स्त्रियों को अल्पआयु में ही माता-पिता अपनी सुझ-बुझ के अनुसार ब्याह देने लगे जिससे बालविवाह की प्रथा प्रचलित हुई। मुस्लिम शासनकाल में मुसलमान युद्ध में जीती हुई राज्य की लडकियों को उठा लेते और वहाँ की प्रजा पर नित्य बलात्कार करते जिससे लोगों ने अपने घरों की स्त्रियों का घरों से बाहर निकलना बंद कर दिया और दुष्ट हवसी मुसलमानों की दुष्ट-दृष्टी से अपनी घर की मर्यादा को बचाने के लिए घुँघट को अनिवार्य कर दिया जिसे आज भारत के मुख्य परिधान साड़ी के रूप में देखा जा सकता है।

          अब समय आ चुका है की स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक वातावरण में आदिकाल के सनातन धर्म के अनुसार नारी शक्ती को उसका समृद्ध एंव गौरवशाली स्थान पुन: एक बार दिया जाये। महिला दिवस जैसे भेदभाव को बढावा देनेवाले कलयुगी त्योहारों को न मनाकर हम अपने सनातनी मुल में स्थित नारी शक्ती को दर्शाते पर्व नवरात्री, दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, सरस्वती पूजा, तुलसी पूजा जैसे शास्त्र सम्मत त्योंहारों को मनाये और नारीयों की सृष्टी जननी के सामर्थ्य को वंदन करें। 
          नारी ही सृष्टी की जनक है, नारी ही आदिशक्ती है, नारी ही माँ, बहन, पत्नी और बेटी है।  नारी देवी है, नारी अधूरे को पूर्ण करनेवाली और पुरूष को पूर्णत: प्राप्त कराने वाली है। नारी जन्म देने वाली, प्रेम करने वाली, पालन करने वाली, भरण-पोषण करने वाली, करूणामयी दया करने वाली है। नारी पुरूष की शक्ती है और नारी ही संपूर्ण संसार है। नारी बिना कल्याण की कल्पनामात्र क्षल है।
          नारी के पात्र अनेक हो सकते हैं लेकिन रूप केवल एक है और वह है जगत् जननी माता का रूप। नारी माँ, बहन, पत्नी या बेटी किसी भी पात्र में मिले किंतु सदैव माता स्वरूप पूजनिय है। आदिकाल से ही भारत के वेदपुराण, धर्मग्रंथ, दंतकथाओं आदि में नारीयों को विशेष और पूजनिय स्थान दिया गया है। दुर्गा, पार्वती, काली, भवानी, भैरवी, सीता, सावित्री, सत्यभामा, मीरा, पद्मावती, जिजामाता, लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई जैसी भगवती देवियों और विरांगनाओं की शक्ती, उपासना, त्याग, प्रेम, सुशासन, बलिदान और साहस की सत्य कथाओं से हमारा इतिहास भरा पडा है। भारत वर्ष की धरती नारी की समानता की प्रत्यक्ष साक्षी है इसलिए मैं समझता हूँ कि, "अंतर्राष्ट्रिय महिला दिवस भारत जैसे उच्च आदर्शवाले देश में मनाना हास्यास्पद ही होगा।"


Writer :- Vikas Bounthiyal
Edited by :- NA
Source of article :- NA 
Source of images :- Self Click
Length of the article :-735 Words (Calculated by wordcounter.net)







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