वीर बालक हकीकत राय - News Beyond The Media House

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Sunday, February 10, 2019

वीर बालक हकीकत राय

     
    ये सत्य कथा उस समय की है जब भारत पर मुगल साशन हुआ करता था। अठारहवीं शताब्दी के समय आज के पाकिस्तान का सियालकोट भारत का ही हिस्सा था और जो लखनऊ के नवाब जकरिया खां के साशन के अंतर्गत आता था। उस समय भारत  को पूरी दुनिया "हिंदुस्थान" के नाम से पहचानने लगी थी। चूँकि आजकल के ज्ञानचंद इसके पीछे ये तर्क देते हैं की भारत में हिंदू बहुसंख्यक थे इसलिए भारत  को ये नाम दिया गया था किन्तु हकीकत तो कुछ और ही है। खैर फिलहाल हम भारत को हिंदुस्तान कहे जाने के पीछे के नफरत, साजिश और हकीकत की बात ना करते हुए सीधे आते हैं उस हकीकत की बात पर जिसको लोगों ने केवल ३०० सालों में ही भुला दिया।

          भारत  आदिकाल से ही अपने ज्ञान, लेखनी, भित्ति-चित्र, शिलालेख, मूर्ति भवन निर्माण आदि कलाओं तथा वेदशास्त्र, लेखनी, संस्कृती और भाषा ज्ञान आदि के लिए पूरी दुनिया में जाना जाने लगा था। अठारहवीं शताब्दी आते-आते भारत  में पूरी दुनिया से लोग व्यापर करने के उद्देश्य से आने लगे और हर कोई इस सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत वर्ष के समृद्ध व्यापर पर अपनी पकड़ बनाना चाहता था। इसी व्यापर जगत में पंजाब के सियालकोट (वर्त्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा) नामक स्थान के एक धनि व्यापारी लाला भागमल खत्री जी का नाम भी आता था। सन १७१९ को इन्ही धनि व्यापारी के घर उनकी पत्नी कौरां देवी की कोख से एक अद्वितीय बालक ने जन्म लिया जिसका नाम हकीकत राय रखा गया। किन्तु माता -पिता इस बात से अनजान थे की आगे चलकर यही हकीकत राय एक इतिहास बनाने वाला था।
          हकीकत राय बाल्यावस्था से ही कुशाग्र प्रवृत्ति का होशियार बालक था जिस कारण उम्र के केवल ५ वर्ष में ही उन्होंने संस्कृत में अपनी दिक्षा शुरू की और कुछ ही वर्षों में वें कई शास्त्रों में निपुण हो गए। किन्तु उनके पिता भागमल जी केवल इतने से संतुष्ट नहीं थे। उस समय व्यापार एंव सरकारी कामकाज फारसी भाषा में ही होते थे इसलिए उनके पिता चाहते थे की हकीकत राय भी फारसी भाषा को सीखे। लाला भागमल खत्री जी ने अपने बेटे हकीकत राय को उम्र के दसवें वर्ष में फारसी सीखाने के उद्देशय से मदरसे में तालीम के लिए भेजना प्रारम्भ कर दिया। चूँकि बालक हकीकत की प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत भाषा में हुई तथा वेद, शास्त्र और पुराणों में ही उनकी रूचि हो चली थी इसलिए उनको पिता के मदरसे  भेजे जाने की बात अमान्य थी किन्तु पिता की बात टालना उनके लिए संभव न था इसलिए मजबूरी में ही उन्हें अपनी आगे की शिक्षा मदरसे में जाकर फारसी भाषा में शुरू करनी पड़ी।
          हकीकत राय प्रतिदिन मदरसे  जाया करते और फारसी भाषा में ही बेमन से बेकार के मदरसाछाप जेहादी बाते पढ़ा करते। सभी बच्चों में एकलौते हिंदू होने की वजह से बाकी के सभी मदरसाछाप मुस्लिम बच्चे उनसे बैर भाव रखते। हकीकत राय ने कुछ ही माह में फारसी भाषा में अपनी पकड़ बना ली जिससे मदरसे  के दूसरे मुस्लिम बच्चों के अभिभावक और मदरसे  के मौलवी के बीच वे काफी चर्चित हो गए। हकीकत राय की कुशाग्रता एंव प्रशंशा से सारे मुस्लिम बच्चे हकीकत राय से ईष्या करने लगे थे। सारे बच्चे हमेशा हकीकत राय को परेशान करने की बाट जोहते और ऐसा कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते जिससे की हकीकत को परेशान किया जा सके या उसे मुसीबत में डाला जा सके। फिर एक दिन मदरसे के दुष्ट जेहादी मुस्लिम बच्चों ने कुछ ऐसा कर डाला जिसने छोटे और निर्दोष हिंदू बालक हकीकत राय को ईस्लाम की बलि चढ़ा दिया।
          एक दिन मदरसों के कुछ मुस्लिम बच्चे हकीकत के बुद्धिमत्ता से जलकर उसे छेड़ने लगे किन्तु बालक हकीकत अब इन सब का आदि हो चूका था। मुस्लिम बच्चों को जब ऐसा प्रतीत हुआ की हमारी उद्दंडता का हकीकत राय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा तब उन्होंने कुछ ऐसा करने की ठानी जिससे हकीकत राय को क्रोध आ जाए। मदरासाछाप बच्चों ने हिंदू धर्म और हिंदू देवी-देवताओं के बारे में भला बुरा कहना शुरू दिया जिससे हकीकत राय को क्रोध आ गया। फिर क्या था मदरसाछाप दुष्ट  मुस्लिम बच्चों को हकीकत राय की दुखती रग पता चल चुकी थी और अब वें रोजाना ही हिंदू धर्म के बारे में नाना प्रकार के बातें बनाते और जिससे हकीकत को क्रोध आ जाता।
          एक दिन मौलवी जी किसी काम से बाहार गए हुए थे तो मदरसे में उनकी अनुपस्तिथी में कुछ दुष्ट  मुस्लिम लड़कों ने हकीकत से बहसबाजी शुरू कर दी। हालाँकि हकीकत को उनकी मंशा समझ में आ गयी थी इसलिए वो अध्ययन में ही ध्यान केंद्रित किये हुए था। जब तक बातों से बात की जा रही थी तब तक हकीकत उन दुष्ट मुस्लिम लडकों को अनदेखा कर सकता था किन्तु अब बात काफी आगे बढ़ चुकी थी। उन दुष्ट मुस्लिम लड़कों में से एक ने हकीकत का ध्यान अपनी और लाने के लिए उसको हाथों के इस्तेमाल से परेशान करना शुरू कर दिया जिसपर हकीकत ने उससे कहा कि, "माँ  दुर्गा  भवानी की कसम हमसे ना उलझो अन्यथा हम मौलवी जी से तुम्हारी शिकायत कर देंगे।बस फिर क्या था दुष्ट मुस्लिम बच्चे तो मानो हकीकत की इस तरह की किसी प्रतिक्रिया की बाट ही जोह रहे थें। एक दुष्ट  बच्चे ने कहा की, "कौन माँ  दुर्गा  भवानी ?" दूसरे दुष्ट बच्चे ने कहा "तेरी माँ  का नाम तो कौरां हैं फिर ये दुर्गा  कौन है जिसको तू माँ  बोल रहा है ?" इसपर हकीकत राय बोला "माँ  दुर्गा  भवानी सारे जगत की माँ  है।" इसपर सारे दुष्ट मुस्लिम बच्चे जोर-जोर से हँसने लगे और कही से एक और हरामखोर दुष्ट बालक आ धमाका और बीच में बोल बैठा की "दुर्गा  तो चुड़ैल है।"  यह सुनकर हकीकत के गुस्से का पारा चढ़ गया और दुष्ट मुल्लों के दुर्गा माँ  के अपमान की क्रिया की प्रतिक्रिया में हकीकत राय ने भी मोहम्म्द रसूल की बेटी फ़ातिमा बीबी को चुड़ैल कह दिया। इसके बाद काफी कहासुनी हुई और हकीकत और मदरसे  के बाकी के दुष्ट मुस्लिम बच्चों में हाथापाई भी हुई।
          मदरसे के मुस्लिम बच्चे दुर्गा  माँ  के बारे में ऐसे-ऐसे अपशब्द कहते जिनको मैं लिख भी नहीं सकता और बदले में हकीकत भी ईस्लाम के परखच्चे उड़ा डालता। हकीकत राय ज्ञान और विवेक में सभी मदरासाछाप मुस्लिम बच्चों से काफी आगे था इसलिए वाद-संवाद में हकीकत राय से जीत पाना तो नामुमकिन ही था। मदरासाछाप दुष्ट मुस्लिम बच्चे हकीकत को दबाने की कोशिश करते किन्तु सारे मिलकर भी अकेले हकीकत राय से जुबानी नहीं जीत पाते और उनमे से कुछ खिंजकर हकीकत राय से हाथापाई करने लगते। हाथापाई करने का एक कारण यह भी था की केवल इसी से हकीकत राय पर कुछ समय के लिए ही सही किन्तु क्षणिक विजय पायी जा सकती थी।
          थोड़ी देर बाद मौलवी साहब अपना काम निपटाकर लौटे तब बच्चों को आपस में झगड़ते देख बौखला  उठे और इस तरह मारपीट का कारण पूँछा। उनमे से एक मदरासाछाप दुष्ट मुस्लिम लडके ने मौलवी को बताया की हकीकत राय ने मोहम्मद रसूल की बेटी फ़ातिमा बीबी के बारे में अपशब्द कहे। इसपर मौलवी भड़क गया और उसने हकीकत राय को बुलाया और पूँछा की क्या ये सच है ? हकीकत राय अपने स्वभाव और संस्कारों के अनुरूप हमेशा सत्य  ही बोला करता था सो मौलवी के सवाल के जवाब में उसने हामी भरते हुए सर हिला दिया। मौलवी इतना सुनते ही बौखला कर चिल्लाया, "नामुराद काफिर, मोहम्मद रसूल की शान में गुस्ताखी करने की तेरी हिम्मत कैसे हुईबालक हकीकत राय ने तब मौलवी को सारी घटना विस्तारपूर्वक बताई और दुष्ट  मदरासाछाप मुस्लिम बच्चों द्वारा परेशान करने की शिकायत भी की। मौलवी ने  जब बाकी के बच्चों से पूँछा तो सभी ने बातो को बड़ा-चढ़ा कर मौलवी के सामने पेश की। उन्होंने और भी कई ईस्लाम की तौहीन करनेवाले मनगढंत आरोप  हकीकत राय पर लगाए जिससे मौलवी को लगा की इस बालक को ईस्लाम की इस कदर तौहीन के करने के लिए दंड देना तो आवश्यक है।
           बालक हकीकत राय से यदि अभ्यासक्रम से सम्बंधित कोई त्रुटि हुई होती तो मौलवी स्वयं उसे दंड  देता लेकिन यहाँ बात ईस्लाम के तौहीन की थी इसलिए मौलवी ने सोचा की एक छोटे बालक को धर्म की तौहीन के लिए दंड देने से कही बात बिगड़ ना जाए और यदि इस बालक को दंड  दिया गया और लोगों को जब पता चलेगा की मोहम्मद रसूल की शान में  गुस्ताखी करने पर भी मौलवी साहब ने कुछ नहीं किया तब भी शरिया कानून के मुताबिक उसे ही दंड दिया जाएगा। काफी सोच विचार करने के बाद मौलवी ने हकीकत राय के गुस्ताखी को काज़ी साहब की अदालत में ले जाने का इरादा कर लिया जिससे उसका ईस्लाम की तौहीन की बात से पीछा छूट जाएगा और तब काज़ी साहब जाने और हकीकत राय जाने।
          एक छोटे से बालक हकीकत राय ने ऐसा क्या कर डाला जो उसको काज़ी साहब की अदालत में तलब किया गया है ये देखने पूरा का पूरा नगर काजी साहब की दरबार में जमा हो गया। जब पिता भागमल और माता कौरां देवी को इस बात का पता चला तो वें भी दौड़े-दौड़े काज़ी साहब की अदालत में हाजिर हुए। मौलवी ने सारी घटना को काजी साहब के सामने कही और गवाही के तौर पर मदरसाछाप दुष्ट मुस्लिम बच्चों की गवाही भी बारी-बारी से ली गयी। सभी दुष्ट मुस्लिम बच्चों ने हकीकत को मजा चखाने के उद्देश्य से एक सुर में हकीकत के खिलाफ गवाही दी। बस फिर क्या था, गवाही मिलते ही काजी ने मोहम्मद रसूल की गुस्ताखी करने के लिए शरिया कानून मुताबिक एक छोटे से बालक को सजा-ए-मौत का हुक्म सुना दिया। मौत की सजा का फरमान सुनकर माता और पिता दोनों स्तब्ध हो गए।
          अपने बेटे को मृत्यु दंड दिए जाने पर पिता भागमल स्वयं को कोसने लगा की आखिर उन्होंने अपने मासूम से बच्चे को मदरसा भेजा ही क्यूँ ? पिता सोचने लगा की पूरे शहर में इतने सारे गुरुकुल है लेकिन मेरी मत्ती मारी गयी थी जो मैंने अपने बालक को फारसी पढ़ाना चाहा। माता -पिता दोनों बिलक-बिलककर कभी मौलवी साहब से रहम की भीख माँगते तो कभी काजी साहब से रहम की भीख माँगतेमाँ  बदहवास हो सड़क पर गिराकर कभी छाती पीटने लगाती तो कभी सर पटकने लगती। पिता कभी काजी के पैर पकड़ता तो कभी अदालत के अन्य उच्च पदाधिकारी सरदारों  के पैर पकड़ता। अदालत में मात्र बालक हकीकत राय शाँत चित्त होकर निर्दोष भाव से खड़ा था। मृत्यु दंड मिलते ही हकीकत राय अपराधी घोषित हो चूका था और सैनिकों  ने उसे जंजीरों और बेड़ियों में जकडकर कालकोठरी में डाल दिया। 

          भागमल खत्री काफी प्रसिद्ध एंव सम्मानीय व्यक्ति थे और व्यापर के चलते उनका पंजाब के जमींदारों, साहूकारों, सरदारों  मुगल रईसों से काफी अच्छे व्यापारिक संबंध थे। भागलमल खत्री जी ने अपने बेटे हकीकत राय को बचाने के लिए एड़ी चोटी का बल लगा दिया और काजी साहब के बालक हकीकत राय की सजा-ए-मौत के फरमान को लखनऊ के नवाब जकरिया खां के दरबार में पुनर्विचार के लिए भिजवाने में सफल हुए। चूँकि अब तक हकीकत राय अपराधी ही था तो उसे सियालकोट से लाहौर तक के १००-१५० किलोमीटर की दूरी एक अपराधी जैसी ही तय करनी थी। एक छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ घोड़ों के पीछे बेड़ियों से बाँधकर पैदल नंगे पाँव बालक हकीकत राय को लाहौर की तरफ नवाब  जकरिया खां के दरबार की तरफ ले जाया जा रहा था। सारे सैनिक घोड़ों पर और उनके साथ-साथ कुछ तमाशबीन नगरवासी बैलगाड़ियों पर लदकर नवाब के दरबार की तरफ सजा-ए-मौत के फरमान पर पुनर्विचार के लिए निकल पड़े थे। 
          सारे रास्ते भर एक ओर माता कौरां देवी सैनिकों से कभी बालक हकीकत को पानी पिलाने, कभी उसे कुछ खिलाने, कभी पैरों में पादुकाएँ पहनाने या उसके घायल पैरों के जख्मों पर दवा लगाने के लिए लाख-लाख मिन्नतें करती तो दूसरी तरफ पिता भागमल बेटे को एक घूँट पानी पिलाने, दो निवाले अन्न के खिलाने या कोई बहाना बनाकर सेना को रुकवाने के लिए सेनानायक को अपने जिंदगी भर की मेहनत की कमाई लुटाते फिर रहे थें। सेना को रुकने के लिए भागमल जी रिश्वत के रूप में भारी रकम देते ताकी उसका बेटा हकीकत राय थोड़ी देर के लिए विश्राम कर सके। लाहौर आते-आते ना जाने माता -पिता कितनी ही बार अपने बेटे  की कराह पर मरे थे व बेटे के एक निवाला खाने पर और एक घूँट पानी पीने पर न जाने कितनी ही बार जिए थे ? अंत:तोगत्वा सैनिक हकीकत राय को लाहौर ले ही आये और वहाँ उसे पुनः एक बार सैनिकों ने कालकोठरी में डाल दिया गया।

          आज नवाब  जकरिया खां के दरबार में ईस्लाम की तौहीन के जुर्म में बालक हकीकत राय को मिले सजा-ए-मौत के काज़ी  के फैसले पर पुनर्विचार होनेवाला था। पिता भागमल ये भली-भाँति जानता था की जकरिया खां अव्वल दर्जे का वहशी, बेरहम और दुष्ट  नवाब  है किन्तु पिता ने अपनी पत्नी कौरां देवी को वचन दिया था की वें किसी भी कीमत पर अपने बच्चे के प्राण को बचा लेंगे। आखिर एक पति के पास इसके अलावा कोई और मार्ग था भी तो नहीं की पुत्रवियोग में तड़पती उसके बालक की माँ  को इस से कम कुछ और वचन दे पाते, सो दे दिया माता को उसके बालक के प्राण की रक्षा का वचन।

          आखिर वो क्षण आ ही गया जिसका पूरी सल्तनत को इंतज़ार था। दरबार लगा और नवाब  दरबार में तशरीफ़ लेकर आये। थोड़ी देर नवाब ने अपने दरबार के विशेष सलाहकार मौलाना साहब  व अन्य सरदारों  से इस विषय पर विचार-विमर्श कर चश्मदीद मदरसे  के बच्चों, जुर्म की शिकायत काजी साहब के पास दर्ज करवानेवाले मदरसे के मौलवी, सजा-ए-मौत का हुक्म देनेवाले सियालकोट के काज़ी  साहब  समेत बालक हकीकत राय को भी तलब किया गया। पूरी तफ्तीश कर लेने के बाद नवाब ने कहाँ की "गलती दोनों पक्षों के बच्चों की है लेकिन हम शरिया कानून के हिसाब से चलते हैं और जिसके अनुसार काफिरों के आराध्य देवी-देवताओं का अपमान करना कोई जुर्म नहीं लेकिन मोहम्म्द रसूल और उनके परिवार के सदस्यों की तौहीन को ईस्लाम की तौहीन मानी जायेगी और ईस्लाम की तौहीन का जुर्म शरिया कानून के अनुसार बहुत बड़ा जुर्म है।"
          नवाब काजी साहब के फैसले को अपनी सहमति तो दे ही चूका था और अब उसने बालक हकीकत राय से अपनी सफाई में कुछ कहने को कहा। नवाब  सोच रहा रहा था की १४-१५ वर्ष का छोटा बालक हकीकत राय घबराकर रोएगा-गिड़गिड़ायेगा और अपने जान की भीख माँगेगा किन्तु ऐसा हुआ नहीं। बालक हकीकत राय शाँत और दृढ़ता से खड़ा रहा और उसने उत्तर दिया की "पहले तो मैं सोच रहा था की मैंने गलती की और जिसकी मुझे माफ़ी माँग लेनी चाहिए किन्तु अब मुझे ऐसा लग रहा है की मैंने जो किया वो बिलकुल सही किया।" इतना सुनते ही नवाब करिया खां क्रोध से उठ खड़ा हुआ और जोर से चिल्लाया "बदजात तेरी इतनी हिम्मत की सच्चे ईमान वाले लाहौर  के नवाब  जकरिया खां के सामने ईस्ला की तौहीन करे"
          नवाब  करिया खां को गुस्से से आगबबूला देख बालक हकीकत राय की माँ  कौरां देवी बेहोश हो गयी और उसके पिता भागमल डर के मारे थरथर काँपने लगे। भागमल नवाब  के सिंहासन की तरफ बड़े और जमीन पर गिरकर अपने बेटे के गुनाहों की माफ़ी माँगने लगे। नवाब  ने सैनिकों को इशारा किया तो सैनिकों  ने भागमल पर कुछ कोड़े रसीद कर उन्हें पकड़ दरबार की एक तरफ कर दिया। नवाब ने सैनिकों को आदेश दिया की तत्काल हकीकत राय को मृत्यु दंड दिया जाए। सारा दरबार सन्न रह गया और बालक हकीकत राय के लिए शोकाकुल हो गया। किन्तु बालक हकीकत राय वीरता से निर्भय होकर दरबार में खड़ा रहा। इतने में नवाब के दकियानूस धर्म के विशेष सलाहकार मौलाना साहब  जो की उनके दायीं तरफ बैठे थे उठाकर नवाब के पास आये। उन्होंने नवाब के कानों में आकर कुछ कहा और जिसके बाद नवाब  ने हकीकत की मृत्यु दंड को कुछ दिनों के लिए टालकर उसे कालकोठरी में डालने का आदेश दे दिया।
          सारा दरबार नवाब जकरिया खां के तत्काल मृत्यु दंड देने के आदेश को कुछ दिनों के लिए टालने पर अचंभित था और इसके पीछे के कारणों से अनभिज्ञ भी था। किन्तु वीर बालक हकीकत राय ये समझ चूका था की अचानक मृत्यु की सजा को टालने के पीछे बेशक नवाब के हरामजादे सलाहकार मौलाना की कोई चाल है। दरअसल मौलाना को बालक हकीकत राय की वीरता रास नहीं आ रही थी और वीर बालक हकीकत राय को इस तरह मौत की सजा दिए जाने पर दुष्ट मौलाना को ईस्लाम की ही हार दिखाई दे रही थी। उसने सोचा की क्यूँ ना कुछ ऐसा किया जाए जिसमे वीर बालक हकीकत राय को इतिहास में वीरता के बदले ईस्लाम का दोषी कहा जाए और हकीकत राय को ईस्लाम की शरण में आने पर माफ़ी मिलने के लिए याद किया जाए जिससे ईस्लाम की उदारता एंव महानता का इतिहास में बोलबाला हो। एक साधारण से हिंदू बालक हकीकत राय द्वारा ईस्लाम की धज्जियाँ उड़ती देख केवल ईस्लाम की झूठी इज्जत बचाने के उद्देश्य से ही उसने नवाब जकरिया खां के कानों में हकीकत राय की मृत्यु दंड को कुछ दिनों के लिए टालने के लिए ही मानों शैतानी आयतें पढ़ी हो।

           कुछ दिनों बाद नवाब  जकरिया खां का दरबार दोबारा लगा और जिसमे वीर बालक हकीकत राय की सजा-ए-मौत तो बरकरार रखी ही गयी थी किन्तु इस बार दरबार लगाने का मकसद कुछ और ही था। मौलाना एक छोटे से बालक के साहस को तोड़कर ईस्लाम की जीत चाहता था इसलिए उसने दोबारा ये सारा प्रपंच रचा। दरबार में एक बार फिर वीर बालक हकीकत राय को पेश किया गया और उस से पूँछा गया की तुझे मौत से डर नहीं लगता ? जिसपर वीर बालक हकीकत राय बोला "मौत से कौन नहीं डरता ? लेकिन जब ये सोचता हूँ की मौत हमारे या तुम्हारे हाथ में नहीं तब डर भी मिथ्या लगाने लगाती है। जब मौत किसी के बस में नहीं तब मैं क्यों मौत से डरूँ ?" इतना सुनते ही नवाब जकरिया खां जोर-जोर से ठहाके लगाकर हँसने लगा।

          हकीकत राय के इस उत्तर को सुनने के बाद नवाब जकरिया खां ने कहा, "मैं लाहौर का नवाब  हूँ, क्या मैं भी तेरे सर पर मँडरा रही मौत से तुझे नहीं बचा सकता ?' वीर बालक हकीकत राय बोला, "यदि आपने ऐसा किया तब क्या आप ईस्लाम की तौहीन करनेवाले के पक्षधर नहीं कहलाओगे ? असल में आप शरिया कानून के हाथ की कठपुतली हो ? बेशक आप लाहौर के नवाब हो और इस दरबार में सारे निर्णय आपके बस में हैं सिवाय मौत के" इसपर मौलाना पुनः नवाब के पास आया और उसने नवाब के कानों में पुनः कुछ कहा और फिर अपने आसन पर जाकर बैठ गया। नवाब जकरिया खां ने हकीकत राय से कहा की "मैं तुम्हारी मौत को टाल सकता हूँ किन्तु केवल एक शर्त  पर" बस इतना सुनते ही भागमल और कौरां देवी दौड़ पड़े और बोले सरकार हमें आपकी सारी शर्ते मंजूर है बस हमारे बच्चे की जान बक्श दो। " उनके इतना बोलते ही सैनिकों  ने दोनों माता -पिता को घसीटकर दरबार के एक किनारे कर दिया।
          नवाब  ने हकीकत राय से दोबारा प्रश्न किया की "यदि तुम मेरी एक शर्त मान लोगे तो मैं तुम्हारी जान बक्श दूँगा।" हकीकत राय ने नवाब से वो शर्त पूँछी तो नवाब ने कहा "क्यूँकि तू अभी छोटा बालक है और तेरे पास जीने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है इसलिए मैं तुझे ईस्लाम कबूल कर अपने गुनाहों से तौबा करने का प्रस्ताव देता हूँ जिससे तेरे गुनाहों को अल्लाह-ताला माफ भी कर देंगे और तुझे जान की माफ़ी भी मिल जायेगी।" हकीकत राय नवाब  की बातों को टकटकी लगाए सुन रहा था और पूरा दरबार हकीकत के उत्तर की प्रतीक्षा में उसपर टकटकी लगाए बैठे थे। हकीकत ने नवाब  से पूँछा की "यदि मैंने ईस्लाम कबूल कर लिया तो क्या मुझे मौत नहीं आएगी ?" इसपर नवाब  बोला की मैं ये ऐलान करता हु की "यदि तू ईस्लाम कबूल कर मुसलमान हो गया तब तेरी जान बक्श दी जाएगी।" हकीकत ने फिर कहा "तो इसका मतलब यदि मैं मुसलमान बन गया तब मैं अमर हो जाऊँगा और कभी मरूँगा ही नहीं  ?"  इसपर मौलाना तमतमा उठा और बोला कि, "बकवास बंद कर और सीधे-सीधे बता ईस्लाम कबूल है की नहीं ?" हकीकत ने अपना प्रश्न फिर से दोहराया की "यदि मैंने ईस्लाम को कबूल कर लिया और मुसलमान बन गया तो क्या मैं कभी भी नहीं मरूंगा ?"

          पूरा दरबार वीर बालक हकीकत राय की विद्वता पर मंत्रमुग्ध हो गया था।  दरबार में उपस्तिथ सभी लोग बड़ी ही उत्सुकता से यह देख रहे थे की नवाब की जीवनदायिनी शर्त की पैरवी करनेवाला तजुर्बेदार बूढ़ा मौलाना और केवल १५ वर्ष के छोटे से बालक दोनों में से तर्कों के इस घमासान में कौन विजय होता है। लोग वीर बालक की चतुराई की मंद-मंद प्रसंशा कर रहे थे जिसकी भनक नवाब के सलाहकार मौलाना को हो चुकी थी। वीर बालक हकीकत राय के प्रश्न पर मौलाना गरजा और बोला, "कंबख्त काफिर मौत तो एक दिन सबको आनी ही है लेकिन तूने ईस्लाम कबूल नहीं किया तो तू बेमौत मारा जाएगा।" वीर बालक हकीकत राय बोला, "तब तो आपको मेरा उत्तर मिल गया होगा। जब ईस्लाम कबूल कर लेने पर भी यदि एक दिन मुझे मौत आनी ही है तब केवल कुछ दिन और जीने के लिया मैं अपना धर्म क्यों छोड़ूँ।" बालक के इतने गूढ़ ज्ञानभरी बाते सुनकर सभी दरबार में उपस्थित लोग आश्चर्य चकित होकर स्तब्ध हो गए।
          उस दिन लाहौर  की दरबार में एक छोटे से बालक हकीकत राय के आगे पूरी ईस्लाम की खुनी आयतों ने घुटने टेक दिए। हकीकत राय के पिता को तो समझ ही नहीं आ रहा था की उसको अपने १५ वर्ष के बेटे पर गर्व होना चाहिए या उसकी होनेवाली हत्या पर दुःख होना चाहिए। दुष्ट नवाब और शैतान का बंदा मौलवी हकबके से हिंदू शेर वीर बालक हकीकत राय की तरफ शुन्य दृस्टि से देखते ही रह गए। काफी देर तक नवाब और मौलाना कभी वीर बालक हकीकत राय की तरफ देखते तो कभी एक दूसरे की तरफ देखते। जब भी वें दोनों ईस्लामी दुष्ट वीर बालक हकीकत राय की तरफ देखते तब ऐसा लगता की मानो उनकी आँखे कह रही हो की मान जा बालक जिद छोड़ दे और ईस्लाम कबूल करके ईस्लाम की इज्जत बचा ले। जब नवाब और मौलाना एक दूसरे को देखते तब ऐसा लगता की मानो एक दूसरे से कह रहे हो की आज ये हिंदू  बालक ईस्लाम का बुरखा उतार कर ही मानेगा। काफी देर बाद मौलवी अपने स्थान से दोबारा उठा और नवाब  के कानों में फिर कोई शैतानी आयतें बोल आया। नवाब  कुछ देर शाँत होकर बैठा रहा और थोड़ी देर कुछ सोचने के बाद बोला, "हकीकत राय को सोचने के लिए हिंदू त्यौहार बसंत पंचमी तक का दिन दिया जाता है और यदि तब तक हकीकत राय ने ईस्लाम कबूल कर मुसलमान बनने की हमारी शर्त  नहीं मानी तो उसी दिन उसे मौत की सजा दी जायेगी।"
          ८ फरवरी १७३४ के दिन बसंत पंचमी का पावन हिंदू  त्यौहार था और चूँकि हकीकत राय ने हिन्दू देवी माँ दुर्गा भवानी के अपमान के बदले ही मोहम्मद मोहम्मद रसूल की बेटी फातिमा बीबी के लिए अपशब्द कहे तो उसकी इस गुनाह का फैसला भी बसंत पंचमी के दिन ही होगा जो की माँ दुर्गा  भवानी के ही अवतार देवी सरस्वती का दिन भी था। इस दिन या तो बालक हकीकत राय ईस्लाम कबूल करने के लिए राजी होगा या इस हिंदू त्यौहार के दिन उसको सजा-ए-मौत दी जायेगी। इतना कहकर नवाब तेजी से उठा और दरबार से बाहर निकल गया। सैनिकों  ने हकीकत राय को एक बार फिर कालकोठरी में ले जाकर बंद कर दिया। उस जमाने में  मुसलामानों की गन्दी नजर कुँवारी हिंदू  लड़कियों पर रहती थी जिसके तोड़ के रूप में बालविवाह प्रचलन में आया था। हकीकत राय का विवाह भी बचपन में ही पंजाब के ही एक छोटे से गाँव बटाला के निवासी किशन सिंह की बेटी लक्ष्मी देवी से करा दिया गया था किन्तु अभी तक लक्ष्मी की विदाई नहीं हुई थी और वो मायके में ही अपने माता -पिता के साथ रहा करती थी। जब इस बात की खबर हकीकत के ससुराल में चली की उनके जवाई को लाहौर  में मृत्यु दंड दिया जानेवाला है तब वहाँ भी कोहराम मच गया।
          बसंत पंचमी को कुछ ही दिन बचे थे और हकीकत के माता -पिता, उसके ससुराल वाले और बाकी के चीर-परिचित रोज-रोज आकर हकीकत को ईस्लाम कबूल कर लेने की सलाह देते किन्तु वीर बालक हकीकत राय अपने निर्णय पर अडिग था। उसका कहना ये था की जब मैंने गलती की ही नहीं तो मैं माफ़ी क्यों माँगू और यदि किसी धर्म का अपमान करने की सजा मौत हैं तो फिर बाकी के मदरसों के उन दुष्ट मुस्लिम बच्चों का क्या जो रोजाना ही हिंदू धर्म के बारे में अनाप-शनाप बोलते रहते थे। नवाब ने केवल मेरा ही धर्म परिवर्तन करवाने का आदेश दिया जबकि उन दुष्ट मुस्लिम बच्चों के भी धर्म परिवर्तन करवाने चाहिए। हकीकत के पिता भागमल जी ने हकीकत को बहुत समझाया किन्तु हकीकत ने किसी की भी एक ना मानी और अपने भीतर के हिंदुत्व की लौ को मृत्यु के बाद भी जलाये रखने के साहसी निर्णय पर अडिग रहा।

          आखिर ८ फरवरी १७३४ का बसंत पंचमी का वो दिन आ ही जाया। एक ओर जहाँ पूरा भारत पतझड़ के मौसम के आगमन में हर्षोल्लासित हो रहा था वही पंजाब में स्थित हकीकत के नगर सियालकोट में, हकीकत के ससुराक बटाला में और पूरे लाहौर में मातम पसरा हुआ था। वीर बालक हकीकत राय की बस एक झलक भर देखने के लिए पूरे पंजाब से लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। एक छोटे से बालक के साहस को देखने आये जनसैलाब को देखकर नवाब , मौलाना, तमाम काजियों, सरदारों आदि के होश उड़ गए थे। जनता में कही विद्रोह न हो जाए इस डर से नवाब के सेना अधिकारियों ने दूसरी रियासतों से भी सेनाये बुला ली थी। एक खुले मैदान पर दरबार लगा और एक ऊँचे सिंहासन पर नवाब तशरीफ़ रखे बैठा था और उसके पासवाले आसन पर वो शैतान का बंदा मौलाना और बाकी के सरदार बैठे थे। उस मैदान की चारों तरफ तमाशबीनों का हुजूम खड़ा था। दूर-दूर से आये हुए कुछ लोग जमीन पर बैठे गए तो कुछ खड़े-खड़े ही ईस्लाम द्वारा रचित मौत का तमाशा देखने लगे। अब वीर हकीकत राय को सैनिकों ने बेड़ियों में जकडकर मैदान में लाया जिसके साथ उसके पिता भागमल और माँ  कौरां देवी भी थी। थोड़ी ही देर में कुछ काले और भद्दे विशालकाय देहवाले जल्लाद भी तलवार भाँजते हुए मैदान में दाखिल होकर मैदान के बीचों-बीच जाकर नवाब के हुक्म की प्रतीक्षा में खड़े हो गए। अब शुरू होनेवाला था ईस्लाम के नाम पर वहशी दरिंदगी का तमाशा।
          नवाब  जकरिया खां ने हकीकत राय से आखरी बार पूछा की "क्या फैसला है तेरा, मौत या ईस्लाम ?" तो जवाब में हकीकत बोला की "मेरे लिए तो दोनों का एक ही अर्थ निकलता है। यदि मैं ईस्लाम को चुनु तब भी एक ना एक दिन तो मुझे मरना तो है ही। तब थोड़े से अधिक जीने के लिए मैं अपने धर्म से क्यों मुँह मोडू। ईश्वर ने कुछ सोच समझकर ही मुझे हिन्दू परिवार में जन्म दिया होगा और यदि वो चाहता की मैं मुसलमान बनु तो पहले ही मुझे मुस्लिम माता -पिता के पास जन्म देता। हर कोई जन्म से हिन्दू ही होता है फिर ना जाने क्यों उसे जन्म के बाद कलमा पढ़वाकर और खतना करवाके मुसलमान बनाया जाता है।" हकीकत राय के इतना कहते ही शैतान का बंदा मौलाना गरजकर बोला "बकवास बंद कर ए-काफिर। आखरी बार पूछता हूँ की ईस्लाम कबूल है या नहीं ?" हकीकत राय की माँ जो उसके बगल में ही खड़ी थी अपने बेटे से बोली "बेटा मान जा और कर ले ईस्लाम कबूल ! मुसलमान बनकर ही सही लेकिन कम से कम तू जीवित तो रहेगा। " हकीकत बोला "माँ  क्या तू चाहती है की मैं एक जिन्दा लाश बनकर जिऊँ ? धर्म हमारा प्राण है और एक बार प्राण को शरीर से निकाल दिया तो उसमे विधर्म ईस्लाम रुपी भूत-प्रेतों का डेरा हो जाएगा। क्या आप चाहोगी की जैसा आज हमारे साथ हो रहा है वैसा ही भविष्य में मैं मुसलमान बनकर दूसरों के साथ करूँ ?"

          अपने बेटे हकीकत राय के इस तरह का जवाब सुनकर माँ कौरां देवी हकीकत को गले लगाकर सिसक-सिसककर रोने लगी। नवाब  जकरिया खां खड़ा हुआ और हकीकत से कहा की अब मेरे पास ज्यादा समय नहीं है और तुझे मैं एक आखरी मौका और देता हूँ। यदि तुने ईस्लाम कबूल कर लिया तो ना केवल तेरी जान बक्श दी जायेगी बल्कि तेरा निकाह एक अच्छे और ऊँचे घराने में करवा दिया जाएगा जिससे भविष्य में तु भी किसी जागीर का नवाब बन सकेगा। नवाब और मौलाना किसी भी कीमत पर हकीकत को मुसलमान बनाकर ईस्लाम की जीत करवाना चाहते थे इसलिए हकीकत को कभी मौत का डर दिखाते तो कभी धन का लालच देते किन्तु वीर बालक हकीकत राय के दृढ़ निश्चय और साहस के आगे आज पूरा ईस्लाम धुल चाट बैठा था। अंत में हारकर नवाब ने जल्लादों को हकीकत राय की हत्या का आदेश दे दिया।

   


















      जल्लादों  के हकीकत की तरफ आता देख माता -पिता पर मानों कहर ही बरस गया। जंजीरों से जकड़ा हकीकत राय एक हाथ से अपनी माता के आँसू पोंछता और दूसरे हाथ से अपने आँसू पोंछता। इस घटना को लिखते हुए मेरी आँखों में भी आँसू आ गए और कुछ देर रो लेने के पश्चात ही मैं पुनः लिखने योग्य हुआ। जब केवल लिखने, सुनने और पढ़ने में ये हाल है तब सोचो एक छोटे से बालक और उसके माता -पिता और पत्नी पर क्या बीती होगी ? जल्लाद बालक हकीकत के समीप आये और उसे खींचकर ले जाने लगे। उनके साथ-साथ माता कौरां देवी भी दौड़ने लगी और वो कभी हकीकत के माथे को छूती, कभी उसके नन्हे कोमल हाथों को पकड़ती, कभी उसकी पीठ सहलाती और कभी उसके गालों को छूने का निरर्थक प्रयास करती। बीच-बीच में जल्लादों के साथ चल रहे सैनिक कौरां देवी को हंटर रसीद देते किन्तु आज कौरां देवी को मानो देवी से सहनशक्ति का वरदान प्राप्त हुआ था। मैं वरदान इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि उसपर हंटर की चोट का कुछ असर नहीं हो रहा था बल्कि इसलिए कह रहा हूँ की बात-बात पर बेहोश होनेवाली कौरां देवी आज बेटे के अंतिम क्षणों में भी उसको दुलार और पुचकार रही थी। दूसरी तरफ हकीकत के पिता भागमल खत्री कभी नवाब तो कभी मौलाना के आगे रहम की भींख माँगते तो कभी सरदारों और व्यापारियों से मदद के लिए गिड़गिड़ाते। इतने में जल्लादों ने हकीकत राय को मैदान के बीचोबीच ले जाकर घुटनों के बल बिठा दिया। 
वीर बालक हकीकत राय अब अपने कुछ अंतिम के बचे क्षणों में केवल प्रभु श्री राम का नाम स्मरण किये जा रहा था। जल्लादों ने हकीकत राय के सर को सामने किया और उनमे से एक जल्लाद ने वीर बालक हकीकत राय की नाजुक सी गर्दन पर "अल्लाह-हो-अकबर" चिल्लाकर एक ही वार में उसके सर को धड़ से अलग कर दिया। इस तरह ८ फरवरी १७३४ को बसंत पंचमी के दिन केवल १५ वर्ष का वीर बालक हकीकत राय शैतानी मजहब ईस्लाम की बलि चढ़कर इतिहास में अमर हो गया।
          इस घटना की जानकारी मिलते ही हकीकत राय की पत्नी लक्ष्मी देवी को उसी दिन सती कर दिया गया। हकीकत के पिता ने काफी पैसे रिश्वत में देकर काजी और सरदारों  से हकीकत राय के शरीर का हिंदू रीती-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार करने के लिए मंजुरी ले ली। वीर बालक हकीकत राय के शरीर को लाहौर से उसके पैतृक स्थान सियालकोट लाया गया और गंगाजल से स्नान करवाकर पूर्ण शास्त्रीय विधी से उसका अंतिम संस्कार किया गया। वीर बालक हकीकत राय की अंतिम यात्रा में पुरे पंजाब  से लोग आये थे और ऐसा कहते हैं  की उस दिन एक औरत जब वीर बालक हकीकत राय को अर्पण हेतु फूलों का हार लेने बाजार निकली तो उसे पूरे सियालकोट में फूलों का हार तो क्या एक साधारण फूल तक ना मिला। निराश हो जब वो औरत खाली हाथ लौट रही थी तभी उसे एक फूलों के हार की दुकान बंद करता हुआ आदमी दिखा जिसके टोकरी में एक हार रखा हुआ था। उसकी दूकान के सामने कुछ लोग उससे वो हार खरीदना चाहते थे लेकिन वो उस हार को बेचना ही नहीं चाहता था। वो औरत उस दुकान में पहुँची और बोली इस हार की जो कीमत चाहे ले लो पर ये हार मुझे दे दो। दूकानदार उससे बोला की ये हार बिकाऊ नहीं है और इस हार को उसने वीर बालक हकीकत राय की अंतिम यात्रा में चढ़ाने के लिए बचा कर रखा है।बाजार में जब बाकी के अन्य लोगों को ये पता चला की उस व्यक्ति के पास एक हार शेष है तब उसकी दूकान के आगे लोगों का जमावड़ा लग गया और हर कोई उस आखरी बचे फूलों के हार को खरीदना चाहता था।
          शहर में लगभग आखरी फूलों के हार को खरीदने के लिए उस दूकान के सामने जमा भीड़ में से कोई बोलता की इस हार के मैं ५ पाई दुँगा, कोई कहता मैं १५ पाई दुँगा तो कई लोग उस एक पाई के फूलों के हार को रुपयों तक में खरीदने को तैयार थे। यकीन मानो उस दौर में रूपया बहुत बड़ी चीज थी। एक सामान्य व्यक्ति अपने पूरे जीवन में भी दस-पाँच रूपया शायद ही कमा पाता होगा। वो औरत अब भी वहीं खड़ी थी। चुँकि उस औरत के बटुवे में कुल मिलकर ३-४ पैसे ही थे और बात रुपयों तक पहुँची तो अपनेआप ही वो उस फूलों के हार को खरीदने की होड़ से बाहर हो चुकी थी। लेकिन पता नहीं अचानक उस औरत को वो फूलों का हार खरीदने की क्या धुन सवार हुई और उसने अपने कानों से एक झटके में नोचते हुए दोनों कानों की सोने की बाली निकाली और दुकानदार की टोकरी में फेंकते हुए टोकरी में से हार उठाकर चली गयी। "कहते हैं की उस दिन वो एक पाई का हार १५ रुपयों में बिका था जिसकी तुलना यदि आज से की जाए तो वो १५ रुपये आज के करोड़ों के बराबर होंगे।"

     

    वीर बालक हकीकत राय की अस्थियों को उसके पिता भागमल खत्री और माता  कौरां देवी ने हरिद्वार में जाकर पवित्र गंगा नदी में विसर्जित किया और माता -पिता दोनों हरिद्वार से फिर कभी वापस सियालकोट नहीं  लौटे। उस दिन के बाद से भागमल जी के व्यापारी मित्रों, रिश्तेदारों, हकीकत राय के ससुराल वालों या किसी भी मित्रों ने उन दोनों को दोबारा कभी भी नहीं देखा। कुछ का कहना था की बेटे की अस्थियों के साथ माता -पिता ने भी स्वयं को गंगा मैया के सुपुर्द कर दिया तो कुछ लोगों का कहना था की वीर बालक हकीकत राय की हत्या से माता कौरां देवी व्याकुल हो उठी और एक दिन उन्होंने गंगा नदी में छलाँग लगाकर अपनी जीवन लीला को ही समाप्त कर दिया जिसके बाद भागमल खत्री ने भी संन्यास ले लिया और हिमालय की ओर निकल गए तथा फिर कभी वापस सियालकोट नहीं लौटे। कहीं-कहीं पिता भागमल खत्री और माता  कौरां देवी दोनों के हिमालय जाकर सन्यास लेने के उल्लेख मिलते हैं। हकीकत चाहे जो भी हो लेकिन एक बात तो ध्रुव सत्य  है की वीर बालक हकीकत राय ने ईस्लाम और मृत्यु में से सहर्ष मृत्यु चुनकर अपने प्राणों के बलिदान से हिंदुत्व को अमर रखा। 


          "धन्य है ऐसी माँ  जिसने वीर बालक हकीकत राय जैसे वीर पुत्र को जन्म दिया ! धन्य है ऐसा पिता जिसने वीर बालक हकीकत राय जैसे बलिदानी की परवरिश की ! धन्य है वो भारत की पवन धरती जहाँ वीर बालक हकीकत राय जैसा महापुरुष अवतरित हुआ ! धन्य है हम जिन्हें उस धर्म में जन्म मिला जिसमे वीर बालक हकीकत राय जैसे युगपुरुष हुए !"

!! सत्य  सनातन की जय हो, विधर्म का नाश हो !!



Writer :- Vikas Bounthiyal
Edited by :- NA
Source of article :- Self Study of Untold Stories  
Source of images :- Google non-copyrighted images
Length of the article :- 5889 Words (Calculated by wordcounter.net)


























































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