जोधा-अकबर की प्रेम कथा जोधा-अकबर की प्रेम कथा Tampering With Indian History - News Beyond The Media House

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Thursday, February 28, 2019

जोधा-अकबर की प्रेम कथा जोधा-अकबर की प्रेम कथा Tampering With Indian History

         
मरियम उद ज़मानी जिसे वामपंथी जोधाबाई बताते हैं। 
मुगल बादशाह मोहम्मद जलाल्लुद्दीन अकबर
          निर्देशक आशुतोष गोवारेकर की वर्ष २००८ में आयी फिल्म जोधा अकबर तो आपने देखी ही होगी। इसके आलावा एकता कपूर के बालाजी टेलीफिल्म्स के बैनर तले प्रसारित सुपर हिट टेलीविज़न धारावाहिक जोधा अकबर का कोई ना कोई एपिसोड भी आपने कभी ना कभी जरूर देखा ही होगा। वैसे तो बॉलीवुड पर भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ कर उसका ईस्लामीकरण करने के आरोप लगते ही आये हैं। सिनेमा जगत पर भगोड़े कायर अंडरवर्ल्ड मुस्लिम डॉन दाऊद अब्राहम के दबाव और दिशा निर्देशों पर भारत के ईस्लामीकरण में फिल्मे बनाने का आरोप लगातार उठाये जा रहे हैं। बॉलीवुड के इतिहास पर यदि नजर डाले तो बॉलीवुड का एक सुरुवाती दौर था जब किसी भी कलाकार को फिल्मों में काम करने के लिए और सफल होने के लिए एक हिन्दू नाम की आवश्यकता होती थी। इसका सबसे उत्कृष्ट उदहारण यूनुस खान उर्फ़ दिलीप कुमार से बेहतर और कोई उदहारण नहीं हो सकता। 
आशुतोष गोवारेकर
एकता कपूर
दिलीप कुमार उर्फ़ यूनुस खान 
दिलीप कुमार उर्फ़ यूनुस खान 
  

      


















    हमें अक्सर ये बताया जाता रहा है की किस तरह यूनुस खान को उनके घर से तथा मजहब से फिल्मों में काम करने की मनाही थी इसलिए उन्होंने उन दिनो में स्वयं मुसलमान होने की बात छुपाये राखी और बॉलीवुड में काम करने के लिए एक हिन्दू नाम दिलीप कुमार का सहारा लिया। हो सकता है की दिलीप कुमार की इन बातों में थोड़ी बहुत सच्चाई हो किन्तु ये एक अधूरा सच है। दरअसल बॉलीवुड का शुरुवाती दौर वह दौर था जब भारत हाल ही में विभाजन का दंश झेल रहा था। ऐसे में कोई भी फिल्म निर्माता किसी मुसलमान को अपनी फिल्मों में काम करवाकर नुकसान उठाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। किन्तु फिर भी हिन्दू स्वभाव से ही सेक्युलर और "जीयो और जीने" दो की धारणा में विश्वास रखता आया है जिसके चलते ही बॉलीवुड के कुछ निर्देशकों और निर्माताओं ने मुस्लिम कलाकारों पर दया दिखाई और उनको हिन्दू नाम रखवाकर फिल्मों में काम देना शुरू किया। हिन्दुओं की यही उदारता और दया बॉलीवुड-जेहाद का रूप लेकर वर्त्तमान में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का विनाश का कारण बनकर हमारे सामने खड़ी है। 
दिलीप कुमार उर्फ़ यूनुस खान 
(भारतिय संस्कृती vs Western Culture की तुलनात्मक खबर के लिए यहाँ पर click करें )

          १९९० के दशक में बॉलीवुड पर भगोड़े कायर अंडरवर्ल्ड मुस्लिम डॉन दाऊद अब्राहम का शिकंजा ऐसा जकड़ा की जिससे पूरा का पूरा फिल्मी कारोबार ईस्लामीकरण में लिप्त हो गया। एक जमाने में मुसलमानों को हिन्दू नाम रखकर ही फिल्मों में काम करना पड़ता था और आज आलम ये है की बॉलीवुड में यदि आपके नाम के आगे खान, अब्राहम, अख्तर जैसे मुस्लिम सरनेम ही आपकी व फिल्म की सफलता के लिए काफी है। बॉलिवुड की ईस्लामिक षडयंत्र के तहत ही शिरडी के साई बाबा फिल्म बनाई गयी थी जिससे हिन्दुओं को गणेश, शिव, हनुमान, भवानी, दुर्गा जैसे प्रचलित सनातनी देवी-देवताओं की भक्ती के मार्ग से कलयुगी पाखंडी साई बाबा का चेला बनाया जा सके। 
भगोड़ा कायर अंडरवर्ल्ड मुस्लिम डॉन दाऊद अब्राहम

          १९९० के दशक में सिनेमा जगत में मुस्लिम डॉन दाऊद अब्राहम के साथ-साथ T-series के संस्थापक स्वर्गीय गुलशन कुमार जी का भी वर्चस्व काफी तेजी से बढ़ रहा था और जिसके चलते हिंदी फिल्मों में देवी माँ के भजनों और गानों का समावेश बड़ी मात्रा में हो रहा था। स्वर्गीय गुलशन कुमार जी के पंजाबी परिवार से होते हुए भी हिंदुत्व के प्रति रुझान और बॉलीवुड में उनकी बढ़ती हुई लोकप्रियता अंडरवर्ल्ड के जेहादियों को रास न आया। १२ अगस्त १९९७ को मुंबई के अँधेरी स्थित जितेश्वर मंदिर के बाहर पूजा से लौटते वक्त एक अन्य मुस्लिम अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सालेम के मुस्लिम शूटर राजा उर्फ़ दाऊद अब्दुल ने गुलशन कुमार जी की हत्या कर दी। हत्या की वजह बताई गयी की अबू सालेम ने गुलशन कुमार जी से १० करोड़ रुपयों की माँग की थी जिसे गुलशन कुमार जी ने यह कहकर ठुकरा दी थी की "तुम्हे १० करोड़ रुपये देने से अच्छा है की उन पैसों से मैं वैष्णों देवी में माता के भक्तों के लिए भंडारा रखवा दूँ।" अबू सालेम को पैसे न देना गुलशन कुमार जी की हत्या की एक वजह तो थी ही किन्तु गुलशन कुमार जी की हत्या के पीछे यही एकमात्र वजह थी ऐसा कई जानकार नहीं मानते। जानकारों की माने तो गुलशन कुमार जी बॉलीवुड-जिहाद के बीच में एक दिवार की तरह खड़े थे जिससे अंडरवर्ल्ड जगत की आँखों में गुलशन कुमार जी किरकिरी बन चुके थे और इसलिए उनकी हत्या की गयी थी। खैर हम आते हैं मुख्य लेख जोधा अकबर की कहानी पर !

          यदि भारत के वास्तविक इतिहास पर नजर डाले तो ऐसा कही भी कोई प्रमाण नहीं मिलता की किसी जोधा नामक राजपुताना कन्या का विवाह दुष्ट जेहादी अकबर बादशाह से हुआ था। जोधा नाम का किरदार ही इतिहास में कहीं भी उल्लेखित नहीं। वामपंथी इतिहासकारों ने अकबर को नर्मदिल और सर्वधर्म समभाव का पक्षधर साबित करने के चक्कर में जोधा का किरदार गढा और जोधा-अकबर की प्रेम कथा Tampering With Indian History को हिन्दू-मुस्लिम प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित किया। बॉलिवुड तो इस तरह के षडयंत्र और Propaganda के लिए जाना ही जाता है लेकिन छोटा पर्दा Television जगत भी इस दुस्साहस में समरूप भागीदार ठहरता है जिसका प्रमाण एकता कपूर का धारावाहिक जोधा अकबर है। Television जगत का इतिहास भी मुस्लिम तुष्टीकरण से और हिंदु उपेक्षा से अछूता नहीं। दूरदर्शन से उसका Slogan “सत्यम शिवम सुँदरम्” हटाया जाना इसका प्रमाण है। खैर हम आते हैं पुन: जोधा-अकबर की प्रेम कथा Tampering With Indian Historyके षडयंत्र और झूठ पर !
          २००८ में प्रदर्शित हुई फिल्म जोधा अकबर में अकबर का किरदार निभा रहें ह्रितिक रोशन को फिल्म में लेकर ही अकबर के किरदार के साथ धोखा किया गया। इस फिल्म में अकबर को ऊँची कद काठी का गठिले शरीर वाला बलवान युवक दिखाया गया जो की शुरूवात में ही एक हाथी से लोहा लेता हुआ दिखाया गया है। इसमें गौर करनेवाली बात यह है की "जो अकबर राजपूत योद्धा महाराणा प्रताप का नाम तक सुनकर पतलून गीली कर देता था उस कमजोर, छोटी कद-काठी के साधारण से नाक-नक्श वाले धुलधुले और दुर्बल शरीर वाले अकबर के रोल के लिए ह्रितिक रोशन को कास्ट करना बडा ही हास्यास्पद और शर्मनाक है।" स्वयं ह्रितिक रोशन को भी ऐसे किरदारों को करने में शर्म आनी चाहिए थी।
राजपूत योद्धा महाराणा प्रताप जिनका नाम से अकबर के पाजामे गीले हो जाते थे 

यदि आज शिवाजी और महाराणा प्रताप होते तो इस विवाद पर क्या कहते ? उसे मेरी एक कविता के माध्यम से जानने के लिए यहाँ पर Click करें। 

पूरी मुगल सल्तनत को अकेले अपने दम पर हिला कर रखनेवाले राजपूत योद्धा महाराणा प्रताप
मुगल सम्राट अकबर के दाँत खट्टे करनेवाले मेवाड़ के शूर वीर महाराणा प्रताप
कमजोर और धुलधुले शरीर वाला अकबर
ऊँची कद काठी का गठिले शरीर वाला बलवान अभिनेता जिसने कायर और डरपोक अकबर बादशाह का किरदार निभाया  

          जब भी इतिहास में मुगलों के अमानवीय एंव क्रूर शासन की बात सामने आती है तो मुगल प्रेमी और हिन्दुओं के दुश्मन वामपंथी इतिहासकारों द्वारा जोधाबाई का काल्पनिक किरदार का नाम लेकर और जोधा-अकबर की प्रेम कथा की कल्पना के सहारे अकबर को नेकदिल और महान शासक साबित कर मुसलमानों की गद्दारी, अत्याचार, बलात्कार और ५० करोड़ हिन्दुओं की धर्म को लेकर नृशंस हत्या के सत्य को दबाने  की कोशिश की जाती है। दुष्ट इतिहासकारों के द्वारा बताया जाता है की कैसे जोधा ने अकबर की आधीनता स्वीकार की और उससे विवाह किया परन्तु अकबर कालीन किसी भी इतिहासकार ने जोधा-अकबर की प्रेम कथा का कोई वर्णन नही किया। यह तो केवल Tampering With Indian History है। अकबर कालीन इतिहासकारों ने अकबर की केवल ५ बेगम बताई है। १) सलीमा सुल्तान २) मरियम उद ज़मानी ३) रज़िया बेगम ४) कासिम बानू बेगम ५) बीबी दौलत शाद
मरियम उद ज़मानी जिसे वामपंथी जोधाबाई बताते हैं। 

          अकबर ने खुद अपनी आत्मकथा अकबरनामा में भी किसी हिन्दू रानी से विवाह का कोई जिक्र नहीं किया था परन्तु हिन्दुओं को नीचा दिखने के लिए धूर्त इतिहासकारों ने अकबर की मृत्यु के करीब 300 साल बाद १८ वीं शताब्दी में अकबर की दूसरी बेगम “मरियम उद ज़मानी” को जोधा बाई बता कर एक झूठी कहानी गढ़कर अकबर और जोधा की प्रेम कथा का गलत इतिहास लिखकर Tampering With Indian History किया। यदि जोधा और अकबर की प्रेम कथा सत्य होती तो उसका उल्लेख "अकबरनामा" और "जहाँगीर नामा" में भी हुआ होता किन्तु उनमे इसका कोई जिक्र नही है।
राजपूत राजा मान सिंह 

राजपूत राजा मान सिंह 

  






















  

        १८ वीं शताब्दी में मरियम उद ज़मानी को हरखा बाई का नाम देकर हिन्दू बताया गया और उसके राजपूत राजा मान सिंह की बेटी होने का झूठा प्रपंच रचा गया। आगे चलकर  १८ वीं शताब्दी के अंत में एक ब्रिटिश लेखक जेम्स टॉड ने अपनी किताब "Analysis and Antique of Rajasthan" में मरियम उद ज़मानी से हरखा बाई बनी इसी रानी को जोधा बाई बताना शुरू कर दिया और इस तरह ये झूठ आगे जाकर इतना प्रबल हो गया की आज यही झूठ भारत के स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया और अब यह झूठ जन जन की जुबान पर सत्य की तरह आ चूका है और इसी झूठ का सहारा लेकर अकबर को सेकुलर और सर्वधर्म-समभाव का पक्षधर एंव एक महान सम्राट साबित किया जा रहा है।
पर्सियन दासी की बेटी हीर कुँवर उर्फ़ मरियम उद ज़मानी द्वारा बनवाया गया मंदिर जिसे दुष्ट वामपंथी इतिहासकारों द्वारा जो जोधाबाई  द्वारा बनवाया गया मंदिर बताया जाता है। 

          जब भी जोधाबाई और अकबर के विवाह का प्रसंग पढ़ने, देखने या सुनने को मिलता है तब मन में केवल एक ही सवाल आता कि, "अपनी आन, बान और शान के लिए मर मिटने वाले राजपूत जो अपनी वीरता के लिए पूरे विश्व मे प्रसिद्ध है तथा  जिन राजपूतों का धड़ अपना सर कटने  बाद भी लड़े तो क्या ऐसे क्षत्रिय योद्धा अपनी अस्मिता से  कभी इस तरह का समझौता कर सकते हैं ?" हजारों की संख्या में एक साथ अग्निकुंड में जौहर करने वाली क्षत्राणियों में से कोई स्वेच्छा से किसी मुगल से विवाह कर सकती है ?
मुसलमानों के हरम से खुद को बचने के लिए जौहर की तैयारी करती हिन्दू शेरनियाँ 

इस्लाम के नाम पर महिलाओं पर होनेवाले शोषण के खिलाफ #World No Hijab Day पर लिखे पोस्ट को पढ़ने के लिए यहाँ पर click करें 

        यदि अकबर के दरबारी 'अबुल फजल' द्वारा लिखित "अकबरनामा" को  पढ़ा जाए तो पूरी किताब में जोधाबाई नाम के किसी भी किरदार का कहीं भी वर्णन नही है। एक अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ जहाँगीर की आत्मकथा जिसे "तुजुक-ए-जहांगिरी" के नाम से जाना जाता है उसमे भी जोधाबाई का उल्लेख ढूँढने पर भी नही मिलता। भला ऐसा कभी हो सकता है की कोई व्यक्ति अपनी आत्मकथा लिखे और उसमे उसने अपनी माँ के बारे में दो पंक्ति भी न लिख हो। जहाँगीर की पूरी आत्मकथा में उनकी माँ के रूप में जोधाबाई का कही भी वर्णन नहीं। हाँ कुछ स्थानों पर हीर कुँवर और हरका बाई का जिक्र जरूर है किन्तु इससे यही साबित होता है की जोधाबाई एक काल्पनिक पात्र है।
दुष्ट अकबर बादशाह का पुत्र जहाँगीर 
Manipulation in Indian history का एक और Article पढ़ने के लिए यहाँ पर Click करें। 

          जहाँगीर की आत्मकथा में अकबर की बेगम और जहाँगीर की माँ के रूप में उल्लेखित हीर कुँवर और हरका बाई की बात करे तो इनका सम्बन्ध राजपूतों से है तो जरूर किन्तु  हीर कुँवर उर्फ हरका बाई कोई राजपूत कन्या नही थी बल्की एक राजपूत राजा को भेंट स्वरुप मिली एक पर्सियन दासी की बेटी थी। आमेर के राजा भारमल को दहेज में रुकमा नाम की एक पर्सियन दासी भेंट की गई थी जिसकी एक छोटी पुत्री भी थी। रुकमा की बेटी होने के कारण उस लड़की को रुकमा-बिट्टी नाम से बुलाते थे आमेर की महारानी ने रुकमा-बिट्टी को ही हीर कुँवर नाम दिया चूँकि हीर कुँवर का लालन पालन राजपूत परिवार में हुआ था इसलिए वह राजपूतों के रीति-रिवाजों से भली भाँति परिचित थी। राजा भारमल उसे कभी हीर कुँवरनी तो कभी हरका कह कर बुलाते थे।

          राजपूतों के क्षेत्र और उत्तराधिकार के विवाद को लेकर राजा भारमल ने जब पड़ोसी राजाओं से सहायता माँगी तब सभी ने आपसी मनमुटाव के चलते उनकी सहायता करने से इनकार कर दिया अतः राजा भारमल को विवश होकर अकबर से सहायता माँगनी पड़ी। दुष्ट अय्याश अकबर ने सहायता के एवज में राजा भारमल की पुत्री से विवाह की शर्त रख दी तो राजा भारमल ने क्रोधित होकर प्रस्ताव ठुकरा दिया। प्रस्ताव अस्वीकृत होने से नाराज होकर अकबर ने भारमल को युद्ध की चुनौती दे दी। आपसी फूट के कारण आसपास के राजाओं ने राजा भारमल की सहायता करने से मना कर दिया। इस अप्रत्याशित स्थिति से राजा भारमल घबरा गए क्योंकि वे जानते थे कि अकबर की सेना उनकी सेना से बहुत बड़ी है सो युद्ध मे अकबर से जीतना संभव नही है। चूँकि राजा भारमल दुष्ट अकबर की लंपटता से भली-भाँति परिचित थे सो उन्होंने कूटनीति का सहारा लेते हुए अकबर के समक्ष संधि प्रस्ताव भेजा कि उन्हें अकबर का राजपूत कन्या से विवाह करने का प्रस्ताव स्वीकार है और वे मुगलो के साथ रिश्ता बनाने के लिए तैयार है। अकबर ने जैसे ही यह संधि प्रस्ताव सुना तो वह विवाह हेतु तुरंत आमेर पहुँच गया। राजा भारमल ने कामुक अकबर को बेवकूफ बनाकर अपनी पर्सियन दासी रुकमा की पुत्री हीर कुँवर का विवाह अकबर से करा दिया जिसे बाद में अकबर ने मरियम-उज-जमानी नाम दिया।

          चूँकि राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था इसलिये ऐतिहासिक ग्रंथो में हीर कुँवरनी को राजा भारमल की पुत्री बता दिया गया जबकि वास्तव में वह कच्छवाह राजकुमारी नही बल्कि दासी-पुत्री थी। राजा भारमल ने यह विवाह एक समझौते की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था।


इस विवाह के विषय मे अरब में बहुत सी किताबों में लिखा है :-
(“ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس”)
हम यकीन नही करते इस निकाह पर हमें संदेह है। 

इसी तरह ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में एक भारतीय मुगल शासक का विवाह एक पर्सियन दासी की पुत्री से करवाए जाने की बात लिखी है :-
अकबर-ए-महुरियत' में यह साफ-साफ लिखा है कि (ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں) 
हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है क्योंकि निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नही थे और ना ही हिन्दू गोद भराई की रस्म हुई थी। 

सिक्ख धर्म गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के विषय मे कहा था कि, "क्षत्रियों ने अब तलवारों और बुद्धि दोनो का इस्तेमाल करना सीख लिया है, मतलब राजपुताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धि का भी काम लेने लगा है।"

17वी सदी में जब 'परसी' भारत भ्रमण के लिये आये तब उन्होंने अपनी रचना ”परसी तित्ता” में लिखा “यह भारतीय राजा एक पर्सियन वैश्या को सही हरम में भेज रहा है अत: हमारे देव(अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें।"

भारतीय राजाओं के दरबारों में राव और भाटों का विशेष स्थान होता था वे राजा के इतिहास को लिखते थे और विरदावली गाते थे उन्होंने साफ साफ लिखा है-
”गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ले ग्याली पसवान कुमारी ,राण राज्या राजपूता ले ली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत।  (1563 AD)"
"मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है। 
हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत 1563 AD"

          इन सारी बातों से यही स्पष्ट होता है की जोधा-अकबर की प्रेम कथा Tampering With Indian History हिन्दुओं के गौरवशाली इतिहास को धूमिल करने व दुष्ट अत्याचारी मुगल बादशाह मोहम्मद जलाल्लुद्दीन अकबर को महान सम्राट साबित करने के लिए बिकाऊ और वामपंथी इतिहासकारों ने मिलकर हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया और जिस षडयंत्र में बॉलीवुड ने भी बखूबी उनका साथ दिया। 

भारतीय त्योहारों को नष्ट करने के इस्लामिक और वामपंथियों द्वारा षडयंत्र को जानने के लिए यहाँ पर click करें 

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Writer :- Vikas Bounthiyal 
Edited by :- NA
Source of article :- Bollywood and Television, Google, Wikipedia, Online Newspapers, self study on the basis of books and social sites.
Source of images :- Google non-copyrighted images
Length of the article :-2562 Words (Calculated by wordcounter.net)

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