अंगद द्वारा रावण को बताई गई १४ बाते ! - News Beyond The Media House

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Sunday, February 17, 2019

अंगद द्वारा रावण को बताई गई १४ बाते !

         

रामायण के ऐतिहासिक युद्ध से पहले प्रभु श्री राम जी ने संधि का प्रस्ताव देकर अंगद को लंका भेजा।लंकेश रावण उस संधी प्रस्ताव को प्रभु श्री राम जी की अक्षमता व विनंती समझ बैठा। रावण को अपने बल और ऐश्वर्य पर इतना अहंकार हो चुका था की वो युद्ध के अलावा किसी दुसरे विकल्प को स्वीकार नही करना चाहता था। अंगद ने प्रभु श्री राम जी की "कर्तव्यपरायणता, दया, करूणा, क्षमा, पराक्रम, पुरूषार्थ, व रणवीरता" आदि सभी क्षमताओं से रावण को न केवल अवगत कराया बल्की उसे युद्ध होने पर संपूर्ण राक्षस कुल पर होनेवाले दूरगामी दुष्परिणामों से भी अवगत कराया किंतु तब भी रावण माता सीता को वापस प्रभु श्री राम जी को सौपने तैय्यार न हुआ। 

          रावण केवल युद्ध चाहता था और उसे युद्ध से कम किसी भी वस्तु में संधि मान्य न थी। अंत: अंगद ने रावण को अपने अंत की तैय्यारी करने की चेतावनी देते हुए उसे उसके ऐसे दुर्गुण बताये जिनमें से यदि एक भी दुर्गुण किसी मनुष्य में हो तो उसे मृतक समान मानना चाहिए। अंगद ने रावण को मृतक सामान चौदह गुणों के बारे में बताया जिनमे से अधिकतर रावण में भी थे अतः निकट भविष्य में इन्हीं दुर्गुणों के कारण अंगद ने रावण को भी मृत्यु का मुख देखने की चेतावनी दी। 

आईये जानते हैं की अंगद द्वारा रावण से कही गयी वो कौन से चौदह दुर्गुण है !

१) कामवासना :- जो व्यक्ती हाड-माँस के शरीर से मोह लगा बैठे और नित्य संभोग में ही सुख तलाशने लगे तो ऐसे व्यक्ती को संसार की दुसरी वस्तु में रूची नहीं लगती जिससे वो परिवार या समाज को कुछ भी नही दे पाता और नित कामवासना की क्रियाओं और कल्पनाओं में ही रमा रहता है। इसलिए ऐसे व्यक्ती को मृत ही जानना चाहिए। कामवासना से ग्रसित व्यक्ति अपने साथ अपनी स्त्री और बच्चों का भी नाश कर देता है।




२) तनु पोषक (Selfish) :- जो व्यक्ती केवल स्वयं के बारे में प्रथम विचार करें उसे तनु पोषक कहते हैं। ऐसा व्यक्ती भोजन, भोगविलास आदि से संबंधित सांसारिक वस्तुओं को दुसरों की अपेक्षा अधिक भोगने की चेष्टा रखता है। ऐसा व्यक्ती समान बँटवारे में विश्वास ना रखकर पहले स्वयं के पोषण की बात सोचता है तथा स्वयं के संतुष्ट हो जाने पर ही वो दुसरों के लिए उस वस्तु को छोडता है। अंगद ने ऐसे व्यक्ती को भी समाज के लिए अनुपयोगी एंव मृत समान कहा है।



३) क्रोधी :- सतत क्रोध मे रहनेवाले व्यक्ती का मन-मस्तिष्क निष्क्रिय हो जाता है। उसके विचार करने की शक्ती क्षिण होकर आवेश उसपर हावी हो जाता है इसलिए अंगद के अनुसार ऐसा विचारहिन व्यक्ती भी मृतक के समान ही होता है।






४) कंजूस :- जिस प्रकार मृत व्यक्ती कभी धन का उपयोग नहीं कर सकता उसी प्रकार कंजुस व्यक्ती भी सदैव कंजूस प्रवृत्ती के कारण कभी धन का उपयोग स्वयं पर, परिवार पर या समाज पर नहीं करता इसलिए उसका ये गुण मृत व्यक्ती समान है। अंगद ने ऐसे व्यक्ती को भी मृत ही कहा जो आजीवन केवल धनसंचय में लगे रहते हैं।




५) विमूढ़ (मुर्ख) :- जिस प्रकार एक मृत शरीर कोई भी निर्णय नही ले सकता। यहाँ तक की एक मुर्दे के दाह संस्कार के सारे निर्णय भी कोई दुसरा जीवित व्यक्ति ही लेता है ठीक इसी प्रकार मूर्ख व्यक्ती भी मृतक की भाँती ही निर्णय लेने मे अक्षम होता है तथा सदैव दुसरों पर आश्रित रहकर मृतक समान ही होता है। 




६) निंदक :- हर समय दुसरों की बुराई करनेवाला व्यक्ती कभी किसी पर उपकार नहीं कर सकता। किसी के अच्छे कार्य में भी कमी निकालकर निंदक अच्छे कार्य में बाधा उत्पन्न करता है जिससे उस अच्छे कार्य से मिलनेवाले लाभ से समाज या अन्यों को नुकसान होता है। इसलिए निंदा कर हानी पहुँचानेवाली पिशाची-प्रवृत्ती वाले मनुष्य को भी अंगद ने मृत समान कहा है।

७) बदनाम व्यक्ती :- जिस प्रकार मृत शरीर सड़कर दुर्गंध फैलाता है जिसके कारण उसके अपने परिजन ही उसका अंतिम संस्कार कर उसे अग्नी में फुँक देते हैं। केवल सड़कर दुर्गंध आने के एक अवगुण के कारण लोग अपने चहेतों को जला देते हैं। तो सोचो एक दुर्गुणों की खान बदनाम व्यक्ति से समाज कैसा व्यहार करेगा ? असम्मानीत और बदनाम व्यक्ती भी समाज में मृर्दे के समान ही उपेक्षित रहता है। समाज जिस प्रकार मृतक को अग्नी देकर उससे अपना पिछा छुडवाता है उसी तरह समाज बदनाम व्यक्ती से भी अपना पिंड छुडाने की चेष्टा रखता है।



८) अति दरिद्र :- जो व्यक्ती दरिद्र होता है वो चाहकर भी धन का उपयोग नही कर पाता और परिवार-समाज के लिए मृत समान ही होता है। समाज सदैव निर्धन व्यक्ति की उपेक्षा करता आया है मानो की निर्धन व्यक्ति में कोई प्राण ही न हो। इसलिए अंगद ने अति दरिद्र व्यक्ति को भी मृतक सामान कहा है। 





९) रोगी :- रोगी व्यक्ती को भोजन, पानी, आनंद आदी बातों का रस नहीं होता और वो सदा अस्वस्थ महसूस करता है। कई बार गंभीर रोगों से ग्रस्त व्यक्ती अपने रोग से छुटकारा पाने के लिए जीवनलीला समाप्त करने की भगवान से प्रार्थना भी करता है। मृत्यु की कामना करनेवाला रोगी भी मृत व्यक्ती के समान ही है।
                                     




१०) अत्यंत वृद्ध :- अति वृद्ध मनुष्य दुर्बलता के कारण दैनिक कार्य करने मे अक्षम होता है तथा सदा दुसरों पर आश्रित होता है। इसलिए अंगद ने अति बूढे व्यक्ती को मृत समान माना है।

११) रिश्वतखोर :- मृत व्यक्ति अपनी अंतिम क्रिया में लगनेवाले धन के लिए दूसरों पर आश्रित रहता है।  पाप की कमाई से अर्जित धन से जीवन यापन करनेवाला व्यक्ती भी एक मृतक के समान होता है जो अपनी निजी आवश्यकता पूर्ण करने के लिए दूसरों से ऐंठे हुए धन पर निर्भर रहता है। इसलिए रिश्वतखोरी का गुण मृतक के गुण के समानांतर ही है और इस गुण से युक्त व्यक्ति भी अंगद के अनुसार मृतक समान होता है।

१२) वाम मार्गी :- ऐसा व्यक्ती हमेशा पूरी दुनिया से उल्टा ही चलता है और हर किसी बात के पिछे पहले नकारात्मकता को ही खोजता है। पीढियों से चली आ रही परंपराओं और संस्कारों में कमी निकालना इनकी आदतो में से एक होती है। धर्म -शास्त्रों के घोर विरोधी होने के कारण ये हमेशा इससे उलट अधर्म के कर्मों में लिप्त रहते हैं। जिस तरह मृत व्यक्ती श्वास नही लेता और निश्चेत पडा रहकर जीवन के विपरित गुणों से युक्त होता है ठीक उसी प्रकार जो व्यक्ती सदा वाम मार्ग पर चले वैसा व्यक्ती जीवित होकर भी मृत समान ही होता है।


१३) शास्त्र विरोधी :- जो व्यक्ती अपने पुर्वजों और संत-महात्माओं द्वारा रचित वेद-शास्त्रों को ना मानकर कलयुग के प्रभाव से प्रेरित रहता है और शास्त्र-विरूद्ध कर्मों में लिप्त रहता है वो सदैव दु:खी ही रहता है। ऐसा व्यक्ती ना केवल भौतिक संसार में शारीरिक तौर पर कष्ट पाता है बल्की मानसिक तौर पर भी  रोगी रहता है। शारीरिक व मानसिक तौर पर रोगी व्यक्ती भी मृतक समान ही है। अपने अल्पज्ञान के कारण ऐसा नास्तिक व्यक्ती सदैव, रोग, दरिद्र व पापग्रस्त होकर न केवल अपना विनाश करता है बल्की अपने साथ-साथ पूरे कुटुंब के सर्वनाश का कारण बनता है। इसलिए अंगद ने रावण को भी शास्त्र-सम्मत कर्म करने की सलाह दी।











१४) विष्णु विमुख (विधर्मी) :- भगवान के अस्तित्व को न माननेवाला नास्तिक मनुष्य पाप व
पुण्य को भी नही मानता। पाप को न मानने से वह निरंकुश होकर अपने निजी लाभ के लिए किसी भी कर्म को करने से नहीं हिचकिचाता जिससे उसके कर्म खराब होते चले जाते हैं। अंगद के अनुसार जो व्यक्ती पापा व पुण्य में भेद ही ना जानें व केवल अपने कल्याणमात्र का विचार करें ऐसा भगवान को ना मानने वाला विष्णु विमुख व्यक्ती भी मृतक समान ही होता है।




Writer :- Vikas Bounthiyal
Edited by :- NA
Source of article :- NA 
Source of images :- Google non-copyrighted images
Length of the article :-1275 Words (Calculated by wordcounter.net)

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