भारतिय संस्कृती vs Western Culture - News Beyond The Media House

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Tuesday, January 15, 2019

भारतिय संस्कृती vs Western Culture

हिंदू त्योहारों को कमतर आँकने की भूल !

          कुछ दशकों से ये देखने मे आया है की हिंदु त्योंहारों, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं पर पश्चिमी देशों का घोर आघात हुआ है। पहले तो भारत के लोग इसका विरोध करते थे किंतु २ दशक से यह देखने को मिल रहा है की भारत के युवा हिंदु ही पश्चिमी लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हमारी मान्यताओं को दकियानूस एंव अंधविश्वास मानकर उसका न केवल विरोध कर रहे हैं बल्की बडी तेजी से पश्चिमी सभ्यताओं की तरफ मुड भी रहे हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो आनेवाले कुछ समय मे भारत से हमारी महान परंपरा और हिंदुत्व ही समाप्त हो जायेगा। आज हमे रामायण और महाभारत जैसे कालजयी गाथा के कुछ गिने चुने नाममात्र ही जानकार मिलते हैं और उनमे भी मतभिन्नता है। हमारे पुराणों, ग्रंथों और ज्ञान पर वामपंथरूपी दिमक लग चुकी है जिसके फलस्वरूप अधिकांशत: हमारे सामने बनावटी ग्रंथ हैं और जिनको पढकर भी हमारे मन में संस्कार नहीं बल्की अपने ही पूर्वजों के ज्ञान पर शंका उत्पन्न होती है। पहले हमारे महान ग्रंथालय को मुगलों ने नष्ट किया फिर अंग्रेजों ने उनमे भ्रम डालकर हमको भरमाया और अंत मे वामपंथियों ने उन ग्रंथों मे सनातन पर आघात की दृष्टी से कई बनावटी तथ्य जोडकर हमारी युवा पीढीयों के सामने प्रस्तुत किया। आज स्थिती इतनी भयानक है की हमें खोजने से भी ग्रंथों की मूल प्रती नहीं मिलती और हम वामपंथियों द्वारा रचित इतिहास, भूगोल और विज्ञान पढने को मजबूर है। वामपंथियों ने अंग्रेजो और कांग्रेसियों के साथ मिलकर भारतियता, हिंदुत्व और हमारी सभ्यता को इतना घृणित बनाकर हमारे विद्यालय के पाठ्यक्रम में डालकर हमें पढाया की जिसे पढ़कर आज हम में से कईयों को स्वयं को भारतिय बोलने मे भी शर्म आती है।

प्रस्तुत चित्र एक विद्यालय के पुस्तक से लिया गया है जिसमे ज्ञ से ज्ञानी पढ़ाने के लिए जिस चित्र में कथित ज्ञानी का चित्र बच्चों को दिखाया जा रहा हैं वो एक बिना मुँछोंवाला दाढ़ीधारी कठमुल्ला है। आज से लगभग १५ साल पहले तक हमने अपनी पुस्तक में ज्ञ से ज्ञानी के रूप में ऋषि की तस्वीर देखी थीं किन्तु अब हमारे बच्चों को ज्ञ से ज्ञानी के रूप में मौलवी दिखाया जा रहा है। पहले ही बॉलीवुड ने पुजारियों को "हवस का पुजारी " बनाकर हमें भरमाया और अब यदि कोई बचपन से सेकुलरता का जहर हमारे बच्चों की नसों में डाल रहा हो तब  तो हो लिया राष्ट्र निर्माण !!


          आज हमारे बीच ऐसे कितने होंगे जिन्होंने गीता पढी होगी ? कितने होंगे जिनको गायत्री मंत्र, हनुमान चालिसा या महामृत्युंजय मंत्र आता होगा ? जवाब लगभग ना ही होगा !

          इस मकर संक्राँति के दिन कई हिंदुओं ने इस त्योंहार का बहिष्कार केवल यह कहकर किया की, "कुछ घंटों के आनंद के लिए हम पतंग के माँजों मे पंछियों को फँसकर मर जाने का कारण नहीं बन सकते।" मैं जहाँ रहता हुँ वहाँ पर बाकायदा एक स्टील व्यापारी ने मंच बनवाकर लाऊड स्पीकरों पर लोगों से पतंग ना उडाने की अपील की और हद तो तब हो गई की उनका साथ देने के लिए कुछ भगवाधारी साधु भी मंच पर उपास्थित थे। मैं ऐसे दुष्टों से ये पुँछना चाहुँगा कि, “क्या आप बकरी ईद मे होनेवाले लगभग ३ से ४ करोड जानवरों की नृशंस हत्या पर भी ऐसी हिमाकत कर सकते हों ?” यदि नहीं तो हिंदुओं के त्योंहारों पर ऊँगली क्यों करते हों ? हिंदु Soft Target है इसलिए उसपर जीवदया का चुतियापा और अन्य समुदायों के कुकर्मों पर चुप्पी। ये बहुत ही निंदनिय एंव दुस्साहस भरी समाजसेवा है और भविष्य में इसका बहुत घातक परिणाम हमारे बच्चों पर ही पड़ने वाला है। खैर आप अपना कार्य करें और हम हिंदु त्योंहारों की साख बचाने का अपना कार्य करेंगे।

आईयें देखते और समझते हैं की किस तरह ईसाई त्योंहार Christmas और New Year मनाना अंधविश्वास तथा बेवकुफी ही है और मकरसंक्राँति एक महान एंव वैज्ञानिक कसौटी पर प्रमाणित त्योंहार है।

          सर्वप्रथम Christmas की बात करते हैं। लगभग डेढ दो हजार साल पहले ईसाइयों ने रोमन्स के पारंपरिक त्योंहार "रोमांस" जो आज भी वें लोग 25 दिसम्बर को एक त्योहर के रूप में मानते है जिसे “डईस नातालिस सोलिस इन्विक्टी” कहते हैं और जिसका अर्थ "अपराजी सूर्य का जन्म दिन” होता है। तो पहले ईसाइयों ने Christianity को रोमन्स पर थोंपने के लिए Christmas के लिए इसी दिन को चुना और अपने इस त्योंहार को पहले तो एक काल्पनिक किरदार Santa Claus को बच्चों मे प्रसिद्ध किया और फिर आगे चलकर वहीं बच्चे जब प्रौढ हुए तब यह प्रथा एक Natural Human Mentality Cycle के तहत उनके बच्चों और फिर उनसे उनके बच्चों तक विष की भाँती पहुँचा। गौरतलब है की महान सनातन संस्कृती के उपासकों द्वारा लाखों साल पहले से मनाया जाने वाला पर्व मकर संक्राँति जो की "सर्दी के प्रकोप पर सूर्य देव के उष्णता के आशिष का पर्व है " और जो  "रात की तुलना मे दिन बडे होकर पृथ्वी के सजिवों के लिए प्राणदायी सिद्ध होता है" तथा "जिसको मनाकर हम ना केवल पृथ्वी पर जीवन की संभावना की खुशिया मनाते हैं बल्की सूर्य के इस परोपकार के लिए उसकी पूजा कर उसकी इस कृतज्ञता के लिए आभार भी प्रकट करते हैं।" भारत मे Christmas की शुरूवात ही भारतियों को पाश्चात्यिकरण की तरफ मोडकर उन्हें पंगू बनाने के लिए की गयी थीं ताकी आसानी से भारतियों को मानसिक रूप से अंग्रेज बनाकर उनपर राज किया जा सकें। आज अंग्रेजियत का आलम ये है की स्वतंत्रता के ७० साल बाद भी हम पश्चिमों के इस हद तक मानसिक गुलाम हो चुके हैं जितना गुलामी के दौर मे भी नहीं थे। गुलाम भारत मे भी लोग हिंदु पर्वों को वैज्ञानिक दॄष्टिकोण से देखते थें व अंग्रेजों के अवैज्ञानिक दकियानूसी परंपराओं का विरोध करते थें । अंग्रेज ये समझ चुके थे कि, "भारत पर यदि राज करना है तो महान भारतिय संस्कृती पर वार करना होगा। चूँकि युद्ध से भारत को गुलाम तो बनाया जा सकता है लेकिन वो गुलामी अधिक दिनों तक नहीं चलनेवाली और भारत को गुलाम बनाकर भी उनकी भारतियता पर विजय नहीं पाया जा सकता" अंग्रेजों को ये पता चल चूका था की भारतीयों को लम्बे समय तक गुलाम बनाना है तो उनकी जडों पर आघात करना होगा। इसलिए उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से भारतिय संस्कृति पर अपने त्योंहारों को थोंपना शुरू किया। अंग्रेजो ने वामपंथियों के साथ मिलकर ऐसा मकडाजाल बुना जिसका भारतियों पर दुरगामी प्रभाव पडा। 

                                               

          आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी पूरा भारत हिंदु त्योंहारों के प्रति उतना उत्सुक नहीं दिखता जितना अंग्रेजों के त्योंहारों के प्रति दिखता है। भारतिय युवा Christmas और 31st December की तैय्यारी हफ्तों-हफ्तों पहले से शुरू कर देता है। युवाओं को ये तक नहीं पता की जिस अंग्रेजों के त्योंहार के प्रति वें इतने लालायित है वो त्योंहार हमारे पूर्वजों की लाशों पर खडा किया गया था और जो पूर्णत: In Logical, Non Scientific और अंधविश्वास से भरा पडा है। दुसरी तरफ जिन त्योंहारों को हमारे पुर्वजों ने आदिकाल से सँजोंकर रखा है और जो पूर्णत: वैज्ञानिक एंव मानव कल्याणकारी है उसके प्रति युवाओं का उदासिनता भरा रवैया है। इस बात मे कोई दो राय नहीं की, “केवल २५० वर्षों मे Christmas जैसा एक दकियानूसी त्योंहार हजारों-लाखों बर्ष पुराने मकर संक्राँती, उत्तरायण और पोंगल जैसे वैज्ञानिक त्योहारों पर भारी पडने का कारण केवल हमारी मूर्खता ही है।” 



अब आते हैं इसपर की किस तरह अंग्रेजों का New Year यानी की 31st December भी एक In Logical और अंधविश्वास ही है और उसको मनानेवाले हिंदू महामुर्ख ! 


          किसी भी नए चीज की शुरुवात करनी हो तो उसे शुरू से ही करना संभव है। यदि आप ये कहे की मैं २४ किलोमीटर  Marathon Race में दौड़ लगाना चाहता हूँ किन्तु मैं दौड़ना  Race के मध्य अर्थात १२ किलोमीटर से शुरू करूँगा, तो क्या आयोजक उसे  Race के मध्य से इस तरह दौड़ने की अनुमति देंगे ? 
यदि किसी विशेष कारणवश आपको अनुमति मिल भी गयी तो क्या आपको कोई विजयी घोषित करेगा ? ठीक इसी तरह जब पृथ्वी सूर्य का चक्कर समाप्त करके पुनः नया चक्कर लगाना प्रारंभ कराती है तब उसे ही नव-वर्ष कहेंगे। क्या कोई भी एक तारीख 31st December को मानकर सदैव उसे ही नया साल मनाना मूर्खता नहीं ? ये  बेवकूफी ही होगी की किसी भी दिन हम नया साल मनाये, कभी भी होली या दिवाली मनायें। 31st December के दिन ना तो पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा  समाप्त करती है और ना ही शुरू करती हम इतना Modern, Educated और आधुनिक होने के बावजूद क्यूँ इतना बेवकूफाना त्यौहार मानते हैं ? 31st December के रात नया साल शुरू होता है ये एक अंधविश्वास है जिसके दो मुख्या कारण है।  

१) कोई भी नया दिन सूर्य के उदित होने पर शुरू होता है, तो फिर 31st December की रात में १२ बजे के बाद नये साल का पहला दिन कैसे शुरू हो सकता हैं ? ये तो अंग्रेजों ने शराब और कामुकता की अपनी भूख को शांत करने के लिए ही रात्रि का समय चुना। कोई भी अच्छा कार्य करने के लिए दिन का समय सब से उत्तम होता है और रात में सारे वर्जित कार्य किये जाते हैं। रात में शुभ मुहूर्त के भी विशेष कारण होते हैं। 

२) 31st December की तारीख में ना तो पृथ्वी पर ना ही प्रकृति में , ना ही पर्यावरण में , ना ही जलवायु अथवा समाज में ऐसा कोई सकारात्मक बदलाव होता है जिसकी खुशियाँ मनाई जा सके। इसलिये इस त्यौहार को एक अंधविश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। 

        चलो इतना सब जानकार भी यदि आप ईसाई है तो 31st December Celebrate करें तब भी कोई बात नहीं किन्तु यदि आप हिन्दू हो और इस त्योहारों को मनाते हो तो आप बेवकूफ हो ! कहने का मतलब ये नहीं की आप आपने ईसाई मित्रों को Christmas और New Year Wish ना करें। आप बेशक अपने ईसाई मित्रों को Christmas और New Year की शुभकामनाये दें किन्तु कुछ ऐसे कारण है जिस वजह से हिन्दुओं को आपस में इन त्योहारों को नहीं मानना चाहिए और इनसे स्वयं व अपने बच्चों को यथासंभव दूरी बनाये रखनी चाहिए। लेख काफी बड़ा हो चूका हैं इसलिए अंत में केवल उन मुख्या कारणों पर शीघ्रता से नज़र डालते हैं जिसके अनुसार पश्चिमी सभ्यता का विरोध अनिवार्य है। 
मकर संक्रांति की वैज्ञानिकता पर अगली पोस्ट पड़ने के लिए यहाँ click करें                                  

पश्चिमी सभ्यता के विरोध के मुख्य कारण :

१) महान भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के उद्येश से भूतकाल में ईसाईयों के काल्पनिक किरदार Santa Claus के माध्यम से हमारे कड़ाके की ठण्ड में सूर्य के उष्णता से मिलनेवाले जीवन की आशा के पर्व उत्तरायण और पोंगल के त्यौहार पर Christmas थोंपा गया था इसलिए इस त्यौहार का बहिष्कार आवश्यक है। 
  
२) 31st December Celebration एक अवैज्ञानिक और काल्पनिक घटना है और हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए मकर संक्रांति जैसा पूर्णतः वैज्ञानिक पर्व हमें विरासत में दिया है। इसलिए 31st December Celebration जैसे अंधविश्वास को ना मानकर हमें सनातन की और मुड़ना चाहिए। 

३) अंग्रेजों ने सनातन संस्कृति को विकृत करने के उद्देश्य से गुलामी के दौर में हम लोगों पर पश्चिमी रिवाजों को थोंपा था। किन्तु आज हम स्वतंत्र हैं और अब हमको अंग्रेजों के मानसिक गुलामी के मकड़जाल से बाहर निकलकर सनातन की राह लेनी चाहिए। 

४) सभी जानते हैं की Christmas और New Year की रात युवा किस तरह की Celebration करते हैं। New Year Celebration की रात "शराब, सिगरेट और SEX"  में से दो चीज लगभग अनिवार्य ही है। या तो शराब और सिगरेट पी लो, या फिर शराब और शबाब का मज़ा चख़ लो ! New Year Party में कितनी ही लड़कियाँ ऐसी मिल जाएँगी जिनको शराब और SEX से कोई Problem नहीं होता। अब ये आपको तय करना है की आपके बच्चे घर की छतों से Communal पतंगें उड़ाएँ या फिर किसी सर्व धर्म समभाव वाली Secular New Year Party में आपके घर की इज्जत उड़ाएँ !

आप क्या चाहोगे....पतंग उड़े या इज्जत ?

लिखने को कारण और भी बहुत है लेकिन शब्दों की सीमा को ध्यान में रखते हुए मैं ये समझता हूँ की भारत में अभी भी बुद्धिजीवी वर्ग है जो कम शब्दों में भी तथ्य की गहराई को समझने की क्षमता रखते हैं। आशा करता हूँ की मेरा ये लेख भारतीय संस्कृति के मरुस्थल हो चुके उपवन में पानी की कुछ बूंदों का काम करेगी, जिससे उपवन ना सही लेकिन किसी सुखी सनातन डंठल को पोषण तो जरूर मिलेगा।  










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