सुभाषचंद्र बोस जन्मदिन पर विशेष ! - News Beyond The Media House

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Wednesday, January 23, 2019

सुभाषचंद्र बोस जन्मदिन पर विशेष !

          नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के बारे में कौन नहीं जानता होगा। आज ही के दिन २३ जनवरी १८९७ को उड़ीसा के कटक गाँव के एक धनी बंगाली परिवार में सुभाषचंद्र बोस जी का जन्म हुआ था। नेताजी से सम्बंधित अनेकों जानकारी कई जगहों पर उपलब्ध है। लगभग हर Library सुभाषचंद्र जी के जीवनी से सम्बंधित पुस्तकों को संग्रहित किये हुए है। Google, Wikipedia जैसे Online Platforms भी नेताजी के बारे में जानकारियों से भरी पड़ी है। आज हम उन सारी जानकारीयों में से नेताजी सुभाषचंद्र बोस से सम्बंधित कुछ ऐसी जानकारी बताने जा रहे हैं जिसको एक ही जगह पर एक साथ पढ़ने मुश्किल से ही मिलेगी।  


आजाद हिन्द फौज (INA)

          अधिकतर लोगों की जानकारी में यह है की नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी ने "आजाद हिन्द फौज" की स्थापना की थी किन्तु यह लेख आपको "आजाद हिन्द फौज" के इतिहास में ना कहे जानेवाली बातों से अवगत कराएगा।
आजाद हिन्द फौज का ध्वज (साभार Wikipedia) 

          २९ अक्टूबर १९१५ को "आर्यन पेशवा" के नाम से विख्यात महान क्रांतिकारी "राजा महेंद्र प्रताप सिंह" ने सर्वप्रथम "आजाद हिन्द" शब्द का इस्तेमाल किया था। अंग्रेज सरकार से सत्ता छीनकर भारतीयों के हाथों में शासन लाने के उद्देश्य से उन्होंने १ दिसम्बर १९१५ को काबुल में गैरसैनिकी संगठन "आजाद हिन्द सरकार" का गठन किया। उस समय के अफगान के बादशाह की सहायता से "राजा महेंद्र प्रताप सिंह" ने भारत की पहली अस्थायी सरकार बनाई जिसके राष्ट्रपति वें स्वयं बने और प्रधानमंत्री  मौलाना बरकतुल्ला खाँ को बनाया किन्तु यह स्वघोषित एकतरफा सरकार स्वतंत्रता के लिए कुछ खास नहीं कर पायी। 

          प्रथम विश्वयुद्ध के समय अस्तित्व में आये गदर क्रांति के नायक रहे प्रीतम सिंह ढिल्लो की जापानी खुफिया विभाग के अधिकारीयों से काफी अच्छे संबंध थे व उन्होंने जापान के इन्ही खुफिया विभाग के मित्रों के माध्यम से जापान सरकार को ब्रिटिशों से लड़ने के लिए भारतीय युद्धबंदियों की सेना (Indian National Army) बनाने की सलाह दी। प्रीतम सिंह ढिल्लो जी की दूरदृष्टि एंव पहल का ही परिणाम था जिससे आगे चलकर जापान ने द्वितीय विश्वयुद्ध में पकड़े गए ब्रिटिश भारतीय सेनिकों को लेकर "आजाद हिन्द फौज" की स्थापना की। जापानी सेना द्वारा युद्ध में पकड़े गए ब्रिटिश सेना के भारतीय टुकड़ी के कप्तान मोहन सिंह को "आजाद हिन्द फौज" की कमान देकर जापान ने उन्हें युद्धबंदी सैनिकों के विशाल समूह को अपने भाषण से सम्बोधित कर ब्रिटिशों के विरुद्ध युद्ध के लिए सहमत करने के लिए कहा। इस तरह १९४२ में कप्तान मोहन सिंह ने जापान की सहायता से "आजाद हिन्द फौज" की स्थापना कर प्रीतम सिंह ढिल्लो की कल्पना को सच कर दिखाया। 

          कप्तान मोहन सिंह को "आजाद हिन्द फौज" की इस सेना का जनरल नियुक्त कर INA की कमान उनके हाथों में सौंपी गयी किन्तु जापानी सैन्य अधिकारीयों से मतभेद के चलते कुछ ही समय पश्चात् मोहन सिंह से INA की कमान लेकर उनको जापानी पुलिस ने जेल भेज दिया और मई १९४२ में गठित "आजाद हिन्द फौज" दिसम्बर १९४२ तक विघटन की स्तिथि में पहुँच गयी। हालाँकि इसके बाद भी महान क्रांतिकारी "रासबिहारी बोस" ने "आजाद हिन्द फौज" के अस्तित्व को बचाने में अहम भूमिका निभाई व इस ओर निरंतर अपना प्रयास जारी रखा। मोहन सिंह जी के जेल जाने के पश्च्यात "रासबिहारी बोस" ने अपने जापानी मित्रों की सहायता से १५ फरवरी १९४३ में पुनः "आजाद हिन्द फौज" की संभावना को जापानी सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल किआनी के नेतृत्व में जीवित रखा किन्तु सेना पूर्णतः जापान के नियंत्रण में थी और कप्तान मोहन सिंह का ये मानना था की भविष्य में जापान INA की इस सेना का दुरुपयोग कर सकती है।

सुभाषचंद्र बोस और जर्मनी के चांसलर अडोल्फ़ हिटलर एक दूसरे से मिलते हुए  (साभार नेताजी रिसर्च ब्यूरो)   


       इसके एक वर्ष उपरांत जून १९४३ में सुभाषचंद्र बोस हिटलर से वार्ता कर जापान की राजधानी टोक्यो पहुँचे और उन्होंने वहाँ से रेडिओ पर अंग्रेजी सरकार के खिलाफ देश ही नहीं बल्कि देश के बाहर भी युद्ध छेड़ने की घोषणा कर दी। हिटलर और जापान के बीच समझौते के तहत नेताजी सुभाषचंद्र बोस सिंगापूर पहुँचे और रासबिहारी बोस जी से आजाद हिन्द फौज का औपचारिक प्रभार Supreme Commander के रूप में ले लिया। उसके अगले ही दिन याने  जुलाई १९४३ को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापूर से आजाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमांडर के रूप में अपना पहला भाषण दिया जिसमे उन्होंने "चलो दिल्ली" का ऐतिहासिक नारा दिया।

     सुभाषचंद्र बोस आजाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमांडर (साभार नेताजी रिसर्च ब्यूरो)   

भारत का पहला प्रधानमंत्री

        इतिहास में भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में पं जवाहरलाल नेहरू का नाम दर्ज है। वामपंथियों और कांग्रेस ने मिलकर इतिहास को भरमा दिया है। यदि विश्व इतिहास की घटनाओं पर नजर डालें तो पता चलता है कि, "देश में १९४७ में काँग्रेस की सरकार बनने से पहले दो-दो सरकारें और भी बन चुकी थी और पं जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनने से पहले दो प्रधानमंत्री और भी बन चुकें थे। सबसे पहले १ दिसम्बर १९१५ को काबुल में "आजाद हिन्द" के नाम से सरकार बानी थी जिसके प्रधानमंत्री थे मौलाना बरकतुल्ला खाँ किन्तु यह सरकार कहीं से भी मान्यता प्राप्त नहीं थी इसलिए जिसका कुछ खास महत्व नहीं निकला। किन्तु इसके बाद एक ऐसी सरकार बनी जिसको स्वतंत्र भारत के प्रथम सरकार एंव जिसके प्रधानमंत्री को भारत का पहला प्रधानमंत्री कहा जाना चाहिए।                                               

          २१ अक्टूबर १९४३ को सुभाषचंद्र बोस ने भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में शपत लेकर आजाद हिन्द फौज के माध्यम से ना केवल स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार बनाई बल्की भारत में British Government Rule को अवैध घोषित कर भारत में अंग्रेजों को घुसपैठी मानकर उनको देश से बहार निकाल फेंकने का संकल्प किया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में बनी प्रथम भारत सरकार को जापान पहले ही समर्थन दे चुका था और नेताजी के हिटलर से मैत्री सम्बन्धों के चलते जर्मनी भी सुभाषचंद्र बोस की सरकार के पक्ष में था। जापान और 
जर्मनी के आलावा भारत का पडोसी देश चीन, कोरिया, फिलीपीन्स, इटली, आयरलैंड और मांचुको (उस समय का एक राजशाही नियंत्रित राज्य) समेत कुल १२ देशों ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में बनी सरकार को अपनी मान्यता दी थी। इन सब सच्चाई के बावजूद हमें हमारे विद्यालय के पाठ्यक्रम में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में पं जवाहरलाल नेहरू को पढ़ाया जाता है।


नेताजी को जापान का उपहार   


       
       ३० दिसम्बर २०१८ की रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह के नामों को बदलने की घोषणा की। ठीक इसी दिन ३० दिसम्बर १९४३ को सर्वप्रथम भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और आजाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमांडर सुभाषचंद्र बोस जी ने अंडमान निकोबार द्वीप पर स्वतंत्र भारत का ध्वज फहराकर ब्रिटिश सरकार को अपने फौलादी लक्ष्य से अवगत कराया था। अंडमान निकोबार द्वीप तीन द्वीपों के समूह "रॉस द्वीप, नील द्वीप और हैवलॉक द्वीप" को मिलाकर बना है और जिनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की घोषणा के बाद से क्रमशः सुभाष चंद्र बोस द्वीप, शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप के नाम से जाना जाएगा। इसमें कोई शक नहीं की ये द्वीप भारत का हिस्सा है किन्तु बहुत कम ही लोगों को ये पता होगा की ये द्वीप कभी जापान का हिस्सा हुआ करते थें। स्वतंत्रता संग्राम के वीर सुभाषचंद्र बोस के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ही जापान ने अंडमान निकोबार द्वीप समूहों को आजाद हिन्द फौज के कार्यकाज के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस को उपहार स्वरुप दे दिया था। 



सुभाषचंद्र बोस की धर्मपत्नी (Emilie Schenkl)
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान नमक सत्याग्रह  

          सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil disobedience movement) को दबाने के लिए अंग्रेजों ने सुभाष चंद्र बोस को जेल भेज दिया जहाँ फरवरी १९३२ में वें बीमार पड़ गए। परिवार वालों की विनती व काँग्रेस के दबाव के चलते ब्रिटिश सरकार उन्हें इलाज के लिए विदेश भेजने तैयार हो गयी। सुभाष चंद्र बोस इलाज करवाने यूरोप के देश ऑस्ट्रिया गए और वहाँ की राजधानी वियना में रहकर स्वास्थ्य लाभ लेने लगे। उसी दौरान वें एक यूरोपीय प्रकाशक के संपर्क में आये और जहाँ से उन्हें 'द इंडियन स्ट्रगल' किताब लिखने का दायित्व मिला। इस किताब को लिखने के लिए बोस को एक ऐसे सहायक की आवश्यकता थी जो अंग्रेजी जानता हो और अंग्रेजी में टाइपिंग भी जनता हो। आगे चलकर उनकी यही सहायक की खोज उनको अपने  जीवन संगिनी से मिलवाने वाली थी।

        सन १९३४ में सुभाष चंद्र बोस के मित्र डॉ माथुर ने उनकी भेंट 23 साल की ऑस्ट्रियाई युवती एमिली शेंकल से करवाई जिनको अंग्रेजी की अच्छी जानकारी थी और जो टाइपिंग भी जानती थी। एमिली शेंकल ने जून १९३४ से सुभाष चंद्र बोस के साथ 'द इंडियन स्ट्रगल' किताब पर सचिव के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। एक साथ काम करने के दौरान ही बोस और एमिली की नजदीकियाँ बढ़ी और नेताजी को एमिली से प्यार हो गया। ३७ वर्ष के क्रांतिकारी युवा ने २३ वर्षिय ऑस्ट्रियाई युवती के सम्मुख शादी का प्रस्ताव रखा जिसे एमिली शेंकल ने स्वीकार कर लिया। 

सुभाषचंद्र बोस और एमिली शेंकले (साभार नेताजी रिसर्च ब्यूरो)   

          सन १९३४ से १९३६ के बीच सुभाष चंद्र बोस और एमिली शेंकल ऑस्ट्रिया और चेकेस्लोवाकिया में एक साथ रहें। अप्रैल और मई १९३७ के दौरान दोनों ने एक दूसरे को कई पत्र लिखें और सुभाष चंद्र बोस के आखरी पत्र को पढ़कर एमिली शेंकल भावुक हो गयी और जिसके बाद दोनों ने शादी करने का निर्णय लिया। शुरुवात में तो एमिली के पिता इस शादी के खिलाफ थे किन्तु सुभाष चंद्र बोस से मिलकर और उनके बारे में जानकर वें अपनी बेटी की शादी भारतीय क्राँतिकारी से करवाने के लिए मान गए। २६ दिसम्बर १९३७ के दिन एमिली शेंकल का २७ वाँ जन्मदिन था और इसी दिन ऑस्ट्रिया के अपने पसंदीदा रिसोर्ट Badgastin Rresort में दोनों ने हिन्दू रीती रिवाज से शादी कर ली।

सुभाषचंद्र बोस का एमिली शेंकले को लिखा पत्र (साभार नेताजी रिसर्च ब्यूरो) 

          एमिली ने हमेशा दुनिया से सुभाष और अपनी शादी की बात को छुपाएँ रखा और इसलिए वें कभी भारत भी नहीं आई। सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के बाद भी उनकी पत्नी एमिली ने सुभाष के परिजनों से कोई आर्थिक सहायता न लेकर आस्ट्रिया में ही रहकर वहाँ के एक तारघर में काम करके जीवन यापन किया।

सुभाष की पुत्री (अनीता बोस फाफ)

          २९ नवम्बर १९४२ को सुभाष चंद्र बोस और एमिली शेंकल बोस को एक बेटी हुई जिसका नाम सुभाष ने अनीता रखा। सुभाष चंद्र बोस ने विमान दुर्घटना में मृत्यु से पहले ऑस्ट्रिया जाकर अपनी बेटी अनीता को देखा था। ८ जनवरी 1943 को सुभाष अपनी पत्नी और बेटी को छोड़कर जर्मनी से जापान के लिए रवाना हो गए। अपनी पत्नी और बेटी को छोड़कर जापान के लिए निकलते वक्त उन्होंने ये नहीं सोचा होगा की अपनी बेटी और पत्नी से अब दोबारा कभी वें मिल नहीं पायेंगे और ये पत्नी एमिली और बेटी अनिता से उनकी आखिरी मुलाकात होगी। इसके ठिक बाद १८ अगस्त १९४५ के हवाई दुर्घटना में उनके निधन की खबर आई।
दाये एमिली सुभाषचंद्र बोस और बाये अनीता शेंकल  (साभार नेताजी रिसर्च ब्यूरो)  

          चूँकि एमिली ने हमेशा ही दुनिया से सुभाष और अपनी शादी की बात को छुपाएँ रखा था इसलिए उनकी बेटी अनीता को लोगों ने हमेशा अनीता शेंकले के नाम से ही जाना।सुभाषचंद्र बोस की अनुपस्तिथी में उनकी धर्मपत्नी एमिली शेंकले बोस ने अपने पति की आखरी निशानी अनीता की जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभाई और ना केवल अनीता की परवरिश में पिता की गैरमौजुदगी के कारण कोई कमी नहीं आने दी बल्की तारघर (Trunk Office) में काम करते हुए अनीता को जर्मनी का अर्थशास्त्री बनाकर सफल भी बनाया। अनीता की माता एमिली शेंकले बोस के त्याग और संघर्ष का ही नतीजा था की बिन पिता की बेटी अनीता शेंकले University of Augsburg में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर बनी। आगे चलकर अनीता शेंकले की शादी बुण्डेस्टैग जर्मनी के सांसद मार्टिन फाफ से हुई। मार्टीन फाफ एक अर्थशास्त्री और Social Democratic Party of Germany के राजनितज्ञ भी है। वें University of Augsburg में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी रह चुके हैं। मार्टीन फाफ से शादी के बाद ही अनीता का नाम अनीता बोस फाफ हुआ। वर्तमान में अनीता बोस फाफ अपने पती के साथ राजनीती में Social Democratic Party of Germany में सक्रीय है। 

          अनीता को उनकी माँ ने बचपन से ही सुभाषचंद्र बोस के बारे में बताया और उन से संबंधित किताबों को पढने के लिए दिया जिसका नतिजा है की अनीता अपने पिता और भारतिय संस्कृती से आज भी जुडी हुई है। अनीता और मार्टीन की तीन संतानें हुई जिनमें एक बेटा जिसका नाम पीटर अरूण (Peter Arun) और दो बेटियाँ जिनका नाम थॉमस कृष्णा (Thomas Krishna) और माया कैरिना (Maya Carina) है। अनीता ने जो नाम अपने तीनों बच्चों को दिए उससे ही उनके भारतिय संस्कृती के प्रती प्यार झलककर दिखाई देता है। तीनों बच्चों को कृष्णा, अरूण और माया जैसे हिंदु नाम देना ही अनीता के भीतर बसे हिंदु राष्ट्रवादी सुभाषचंद्र बोस को दर्शाता है। 

इससे स्पष्ट होता है कि, "एक राष्ट्रवादी लौ की ज्वाला युगों-युगों तक पुश्तों-पुश्तों तक, एक पीढीयों से लेकर दुसरे पीढी तक सदैव हस्तांतरित होती रहती है। राष्ट्रवादी सोच के प्रवाह में देश की सीमा, भाषा की भिन्नता अथवा सभ्यताओं का भेद कोई अवरोध उत्पन्न नहीं करता।" 

धन्य है वो वंशावली जिसने तीन पीढीयों तक क्राँती को पहुँचाया जिस राष्ट्रवादी विचारधरा के प्रवाह की गणना अभी भी यथावत चालू है और इस बात में कोई दो राय नहीं की यह राष्ट्रवादी विचारधरा आनेवाली बोस संतानों में भी प्रवाहीत होती ही रहेंगी। 

          ऑग्सबर्ग युनिवर्सिटी में अर्थशास्त्री के प्रवक्ता पद से निवृत्ती के पश्चात अनीता बोस ने अपने पिता पर पुस्तक लिखने का विचार किया। इस पुस्तक को लिखने से पुर्व उन्होंने काफी शोध किया व नेताजी सुभाषचंद्र की जीवनी लिख चुके अन्य लेखकों से भी विचार-विमर्श किया। अपनी माँ से विरासत मे मिले पिता की जानकारी व अन्य शोध-सामग्री के माध्यम से अनीता बोस फाफ ने अपने पिता सुभाषचंद्र बोस पर लिखी किताब को शीर्षक दिया “सुभाषचंद्र बोस एण्ड जर्मनी” जिसे उन्होंने मुलत: अंग्रेजी में लिखा जिसे “Indo German Society Of India” ने अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित किया जिसे बाद मे अन्य भाषाओं मे भी प्रकाशित किया गया। ६ फरवरी २०१३ को अनीता बोस फाफ ने भारत आकर इस पुस्तक की पहली प्रति तत्कालिन राष्ट्रपती प्रणव मुखर्जी को दिल्ली स्थित राष्ट्रपती भवन में जाकर भेंट स्वरूप दी।

सुभाष की मौत का रहस्य 

           १८ अगस्त १९४५ को सुभाषचंद्र बोस अपने एक सहयोगी कर्नल हबीबुर रहमान के साथ विमान से मंचूरिया जा रहे थे और उसके बाद से उनको कभी किसी ने भी नहीं देखा। उसके ठीक चार दिनों बाद जापान की एक संस्था ने २३ अगस्त को ये जानकारी दी की सुभाषचंद्र बोस का विमान ताईवान में दुर्घटनाग्रस्त होकर गिर गया जिसमे उनकी मौत हो गयी। नेताजी की मौत पर बहस तब छिड़ी जब इस घटना के कुछ ही दिनों बाद जापान की सरकार की तरफ से ये बताया गया की १८ अगस्त के दिन ताईवान में कोई भी विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर नहीं गिरा। इसके बाद से लेकर आज तक ये रहस्य बना हुआ है कि, "नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई या फिर वें किसी षडयंत्र का शिकार हुए ?"


          सायक सेन नामक एक व्यक्ति ने मार्च २०१७ में एक RTI (Right to information) दायर की थी जिसमे उन्होंने भारत सरकार से नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु कब,कैसे और कहाँ हुई थी इसके बारे में पूछा था जिसके जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि, "नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत १८ अगस्त १९४५ में ताइवान में दिन के लगभग २:३० बजे हुए एक प्लेन हादसे में हुई थी।"

         केंद्र सरकार के इस जवाब पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार ने नाराजगी जताते हुए कहा की "सरकार बिना किसी ठोस सबूतों के नेताजी की मौत का दावा कैसे कर सकती है ?" जबकि सुभाषचंद्र बोसे की मृत्यु की जाँच के लिए १९९९ "मुखर्जी कमीशन" ने साफ तौर पर बताया था कि नेताजी की मौत विमान हादसे में नहीं हुई थी। "मुखर्जी कमीशन" का गठन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायधीश न्यायमूर्ति मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता में गया और इस "मुखर्जी आयोग" ने ७ वर्षों की लम्बी जाँच के बाद ६ मई २००६ को भारत सरकार के सम्मुख अपनी जाँच के दस्तावेज एंव निष्कर्ष को प्रस्तुत किया जिसमे पूरे पुख्ता सबूतों के साथ सरकार के सम्मुख ये बात राखी गयी कि, "१८ अगस्त १९४५ को ताईवान या उसके आसपास के किसी भी इलाकों में ही नही बल्कि ताईवान के आसपास के किसी भी देश में कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ जिससे ये साफ होता है की नेताजी सुभाषचंद्र बोस का विमान १८ अगस्त १९४५ को दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था और उनकी मृत्यु भी किसी विमान दुर्घटना में नहीं हुई। हाँलाकि "मुखर्जी आयोग" ने इस बात को स्वीकार किया की इस समय नेताजी जीवित नहीं है।


न्यायधीश न्यायमूर्ति मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता वाली "मुखर्जी आयोग" की रिपोर्ट में निकले निष्कर्ष निम्न प्रकार से है :-

  1. ताईवान ने ये स्पष्ट कहाँ है की १८ अगस्त १९४५ को ताईवान में कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर नहीं गिरा। 
  2. नेताजी सुभाषचंद्र बोस अभी जीवित तो नहीं किन्तु १८ अगस्त १९४५ को उनकी मृत्यु नही हुई थी। 
  3. सितम्बर १९४५ को जो अस्थियाँ सुभाषचंद्र बोस की बताकर जापान के टोकियो स्तिथ रेनकोजी मंदिर लाकर संग्रहित की गयी थी वह अस्थियाँ नेताजी सुभाषचंद्र बोस की नही है।
  4. १९७० के समय फैज़ाबाद (वर्त्तमान में आयोध्या) में आये गुमनामी बाबा उर्फ भगवनजी ही सुभाषचंद्र थे इसका कोई ठोस सबूत नहीं। 

जहाँ एक ओर मुखर्जी आयोग सुभाषचंद्र बोस की १९४५ के विमान हादसे में मृत्यु की बात को नकारती है वहीं मुखर्जी कमीशन से पहले बनें दो और जाँच आयोगों ने १९४५ के विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु की बात को सही माना। 


         किन्तु विमान हादसे के समय नेताजी के साथ मौजूद एकमात्र व्यक्ति कर्नल हबीबुर रहमान ने आजाद हिन्द सरकार के सूचना मंत्री एसए नैयर, रूसी तथा अमेरिकी जासूसों और शाहनवाज समिति के सामने बनावटी, संधिग्द एंव विरोधाभासी बयान दिए थे। इसके अलावा ताईवान सरकार का उस दिन या उसके आसपास के किसी भी दिन पर उनके तथा देश से सटे सभी सीमाओं के अंतर्गत किसी भी विमान के दुर्घटना होने की बात से इंकार किया। ताईवान व अन्य देशों के आधिकारिक रेकॉर्डस में भी १८ अगस्त १९४५ के दिन किसी भी विमान हादसे के रेकॉर्ड दर्ज नहीं है। इस बात से स्पष्ट है की नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ के विमान हादसे में नहीं हुई थी और वें किसी साजिश का शिकार हुए थे जिसमे जवाहर लाल नेहरू और काँग्रेस की भी भूमिका भी संदिग्ध है। 


सुभाष की हत्या की आशंका 

          ताईवान के अनुसार १८ अगस्त १९४५ के दिन कोई विमान हादसा नहीं हुआ तो आखिर सुभाषचंद्र बोस कहाँ गायब हो गए ? द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्च्यात England, रशिया समेत कई अन्य मित्र राष्ट्रों ने सुभाषचंद्र बोस को द्वितीय विश्वयुद्ध का आरोपी (War Criminal) घोषित किया और किसी भी हाल में सुभाषचंद्र बोस को जिन्दा या मुर्दा पकड़ना चाहती थी। इसी वजह से शायद सुभाषचंद्र ने विमान दुर्घटना का नाटक रचा और वहाँ से वें रूस चले गए। रूस के तानाशाह जोज़ेफ विसारिओनोविच स्टालिन सुभाषचंद्र बोस के द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर का समर्थन करने की बात से नाराज था और इसलिए उसने सुभाषचंद्र बोस जी को बंधी बना लिया। जवाहर लाल नेहरू पर ये आरोप लगा की जब उन्हें इस बात का पता चला की नेताजी स्टालिन की कैद में हैं तब उन्होंने इसकी सूचना ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को दी। इसके बाद ब्रिटेन और स्टालिन ने द्वितीय विश्वयुद्ध में हुए क्षति के लिए हिटलर के सामानांतर ही सुभाषचंद्र बोस को भी दोषी माना और उनको इस अपराध के लिए मृत्युदंड की सजा निर्धारित की। 

बीजेपी के वरिष्ठ  सुब्रमण्यम स्वामी प्रेस वार्ता करते हुए  (साभार The Economic Times

          वरिष्ठ भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी जी ने जवाहर लाल नेहरू पर ये आरोप लगाया की जब स्टालिन और ब्रिटिश के प्रधानमंत्री ने सुभाषचंद्र बोस को द्वितीय विश्वयुद्ध का आरोपी (War Criminal) दोष देकर मृत्युदंड की सजा दिए जाने के विचार पर नेहरू से उनकी राय पूँछी तब नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस की हत्या के लिए हामी भरते हुए इस कुकृत्य के लिए अपनी भी सहमति दे दी और जिसके बाद ही स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी को War Criminal कहकर रशियन तानाशाह जोज़ेफ स्टालिन ने उनकी हत्या करवा दी। 



                                                                   लेखक : विकास बौंठियाल



Writer :- Vikas Bounthiyal

Edited by :- NA

Source of article :- Wikipedia, सुभाषचंद्र बोस पर पुस्तके, इतिहास के जानकार मित्रों से विचार-विमर्श,  Internet पर उपलब्ध  लेख, समाचारपत्रों  व  अन्य शोध सामग्री है। 

Source of images :- Wikipedia, The Economic Times, नेताजी रिसर्च ब्यूरो व Google non-copyrighted images

Length of the article :- 3344 Words (Calculated by wordcounter.net)




  

          
            











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