मकर संक्राँति पर कबूतरबाजी - News Beyond The Media House

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Sunday, January 13, 2019

मकर संक्राँति पर कबूतरबाजी



       
       









          मकर संक्रांति आ ही गयी और इसी के साथ हिन्दू पर्व और रीति-रिवाजों को पानी पी-पीकर कोसनेवालों और हिंदु परंपराओं के विरोध में ज्ञान पेलनेवालों भारत के कथित बुद्धिजीवीयों का एक विशेष तबका जिनमे कई पशुपछी-प्रेमी NGO, वामिपंथी पत्रकारों , बड़े-बड़े Corporate's में काम करनेवाले पढ़े-लिखे Secular's, रोज Dinner में मुर्गा तोड़नेवाले नरपिशाचों आदि आदि लोग कुत्तों की तरह एक सुर में भौंक-भौंक कर हिन्दुओं को ये कहेंगे कि, "मकर संक्रांति के पावन अवसर पर पतंग उड़ाने से पंछियों को उसके माँजे में फंसकर घायल होना और जान गवाँना पड़ता है।" ये वही ज्ञानचंदों की Team हैं जो एक ओर ईस्लामिक त्यौहार "बकरी ईद" में  होनेवाले पशुओ पर नृशंस क्रूरता पर सारी मानवता और पशु-प्रेम को दरकिनार कर जानवरों की हत्या के इस अमानवीय पर्व को अमन और शांति का पर्व ना केवल मानते हैं बल्कि उसमे शरीक होकर दावत भी उड़ाते हैं। ये वही दयावान और समाज का जागरूक नागरिक होता है जो एक ओर तो मकर संक्रांति के लाखो वर्ष पुराने परंपरागत त्योहार मे उडाये जानेवाले पतंग से गिनती के कुछ कबूतरों के मरने पर छाती पिटनी शुरू कर देते हैं किंतु दुसरी तरफ जानवरों पर ईस्लामिक क्रूरता के प्रति दया का उनके मुँह से एक शब्द तक नहीं निकलता। केवल कुछ सौ वर्ष पुराने धर्म के दकियानुसी पर्व जिसमे Religious Practice के नाम पर लाखों बेजुबान जानवरों को जानबुझकर मारा जाता है वह ईद इन हरामखोरों को खुशियों का त्योंहार लगता है और अपनी-अपनी Social Sites पर ऐसे लोग ईद की मुबारकबाद देते हुए नहीं थकते। दु:ख तो इस बात का होता है की हिंदु भी अपने ही त्योंहारों का विरोध करता हुआ ऐसे लोगों से कंधों से कंधा मिलाकर उनका साथ देता है एंव गैर-हिंदु अमानविय त्योंहारों पर बधाई देकर खुद को Modern दिखाने का प्रयंत्न करता है। आजकल ये एक फैशन चलन मे हैं की आप हिंदु त्योंहारों पर कमी एंव अंधविश्वास निकालों और दुसरे पंथ के बीना Logic वाले त्योंहारों पर Secular होने का दिखावा शुरू कर दो वो बीना ये सोचे की निकट भविष्य मे इसका भारतिय समाज पर क्या Impact होगा ?

          कथित पशु-पक्षियों के अधिकारों के प्रति जागरूक तबकों के Social Sites पर शनिवार शाम से ही मकर संक्रांति पर उड़ाए जानेवाले पतंग के प्रति विरोधी Post देखने को मिली। मकर संक्रांति से ठीक दो दिन पहले इन हरामखोरों ने अपनी हरकते शुरू कर दी। चुँकी शनिवार अधिकतर काम का आधा दिन और शराब का समय होता है ऊपर से अगले दिन रविवार और फिर मकर संक्राँती याने फिर छुट्टी मतलब बकलौली और सेक्युलरता का ज्ञान पेलने के लिए एक लंबा समय। इसलिए उठाया मोबाईल, लैपटॉप और फेसबुक, ट्वीटर, Instagraam आदि आदि साईंटों पर कर दी खुद को Modern और जागरूक नागरिक साबित करनेवाली पोस्ट। एक हाथ मे मुर्गी मारकर उसकी टॉग से बना हुआ लॉलीपॉप और दुसरे हाथ की अँगुलियों की से जानवरों के प्रती सहानभुती वाले मबाईल और कंप्युटर पर बटन दबाओं। वाह भई मोडर्नई, वाह भई सेक्युलरी !!

          ठिक ऐसे ही मुझे सन् २०१५ की दिवाली याद है जब पहली बार मेरा सामना प्रत्यक्ष रूप से एक इसी प्रकार के हिंदु विरोधी जागरूक नागरिकों के संघटन से हुआ। मैं मुँबई के पवई हिरानंदानी के Old Market मे Meat और Grocery Products के एक Shop “Meats and More” मे Manager के पद पर कार्य करता था। दिवाली का समय था और पवई के उस Reach और High Profile इलाके में अमीरों के कुछ बच्चे पटाके फोड रहे थे। इतने में कुछ १५-२० लोगों का गृप आया जिसमे अधिकतर १२ से १५ साल के बच्चे ही थे और नाम मात्र के वयस्क थे। सभी के हाथों मे एक-एक तख्तियाँ थी जिसमे प्रत्येक तख्तियों पर “Say No To Crackers”, “Avoid Sound Pollution”, “Say No To Air Pollution”, “Say No To Crackers” जैसे कुछ ना कुछ वाक्य लिखें थे। वें उस परिसर मे हाथों मे तख्तियाँ लेकर पटाके फोड रहे लोगों को घेरकर खडे हो जाते और पटाके फोड रहे बच्चों के अभिभावकों को शर्मींदा करते की एक हमारे बच्चे है जो अपना मन मारकर समाज कल्याण का कार्य कर रहे हैं और एक तुम्हारे बच्चे है जो दो पल के खुशी के लिए बेकार के हिंदु त्योंहारों पर प्रदूषण फैला रहे हैं। उन्होंने कोई नारा तो नहीं लगाया केवल हाथों पर की तख्तियों को छाती से ऊपर सर की तरफ ऊँचा करके खडे हो जाते मानों पटाके फोडकर हिंदु त्योंहारों को मनानेवाले बच्चे जाहिल और हाथों में तख्तियाँ पकडकर उसका विरोध करनेवाले बच्चे समाज एंव कर्तव्यों के प्रती जागरूक ! उनको देखकर लोग शर्म के मारे पटाके फोडना बंद कर देते और वो गृप आगे ऐसे ही जागरूकता का बेहुदा मजाक फैलाने आगे बढ जाता। वे हरामखोंर इसी तरह का दुस्साहस हर जगह घुम-घुमकर करने लगे। उस समय तो मुझे ये सब राष्ट्र-हित में किया गया बेहतरिन कार्य लगा और मैं उन लोगों से काफी प्रभावित हुआ। एक ७-८ साल के छोटे बच्चे ने मुझ से पुँछा की, “Is they gone ?” जिसके उत्तर में मैंने उस से “Yes” कहाँ ! फिर एक और छोटी लडकी आयी जिसकी उम्र तकरीबन १२ साल की रही होगी और शायद वो उस छोटे बच्चे की बहन थी। उस लडकी ने मुझ से कहाँ, “Bhaiyaa can we brust the crackers now ?” मैंने प्रति उत्तर में उस से सीर हिलाकर “No” कह दिया ! किंतु कुछ दिनों बाद मुझे इस बात का बेहद बुरा लगा की किस तरह बच्चे मेरे पास आशा से आये और सोचा की यदी Shopper भैय्या ने हामी भरी तो हम पटाके फोड पायेंगे और दिवाली मना पायेंगे। ये तब की बात थी, यदि आज कोई मेरे सामने बच्चों को पटाके फोडने से मना करें तो शायद मैं उसे ही फोड दुँ। हर साल त्योंहारों पर अपने आस-पास ऐसे बेवकुफ लोग ज्ञान पेलते हुए मिल जाते हैं वहीं नये साल पर फोडे जानेवाले पटाखों से इन कथित प्रदूषण-विज्ञानियों कोई बुराई नजर नहीं आती। आधिकारिक रूप से On Paper मकर संक्रांति पर पतंग की डोर से कटकर व फँसकर मरनेवाले पंछियों की संख्या सैकडा भी पार नहीं कर पाती तो ये बेजुबान जानवरों के प्रति सहानुभूती और मानवता दिखाने लगते हैं किंतु भारत मे केवल बकरी ईद पर ही कुर्बानी मे आधिकारिक तौर पर On Papers Record ४ लाख बकरी, १ लाख गाय, ७५ हजार मुर्गे और न जाने कितने बेजुबानों को मारा जाता है लेकिन इन भाँडों को इसमें अहिंसा और अत्याचार नजर नहीं आता।
          दिल्ली के एक प्रोफेसर की रिसर्च मे ये साबित हुआ है की हलाल माँस जो की मुस्लिमों की जानवरों को मारने की विशेष क्रिया से प्राप्त होनेवाला माँस जिसे “Halaal Certified Meat” कहते हैं और जो की दुनियाभर मे आनेवाले भूकंप, सूनामी तथा अन्य प्राकृतिक आपदा का मुख्य कारण है। जानवरों को “Halaal Certifying” करवाने के लिए माँस उत्पादक कंपनी जिस प्रक्रिया से गुजरती है उसमे मौत के समय जानवरों को सामान्य कत्लखानों मे होनेवाले मौतों की तुलना मे अधिक कष्ट होता है और उनकी मौत के समय निकलनेवाली चित्कारियाँ, कराह, और स्वयं को किसी तरह बचालेने की तडप भरी आह पूरे ब्रह्माँड मे हमेशा के लिए कभी ना खत्म होनेवाली एक कंपन या Vibrations छोड देती है जो की भविष्य मे होनेवाली किसी भी Natural Digester का एक कारण होती है। लेकिन भाँड बुद्धीजीवियों को इस तरह के गैरमानविय, अविज्ञानी और बिना Logic के त्योंहारों पर मानों साँप सुँघ जाता है वहीं हिंदु त्योंहारों की बात करें तो जो एक पूर्णत: वैज्ञानिक, Logical और मानवता का संदेश देनेवाला त्योंहार होने के बावजूद पढा-लिखा मूर्ख सेक्युलर हिंदु उसमे नुकसान और अंधविश्वास ढुँड-ढुँढकर निकालते हैं।

          यदि गहराई से प्रदुषण की बात करें तो गौरतलब है की बकरी ईद जिसे ईद ऊस ज़ुहा भी कहा जाता है जिसमे एक ही दिन मे ३ से ४ करोड जानवरों का कत्ल किया जाता है और उन जानवरों के माँस और बहाये गये खून को साफ करने के लिए ही केवल भारत मे ही ५०० लीटर पानी प्रति पशु लगता है तो केवल ईद के एक दिन मे दिन में कत्ल किये जाने वाले जानवरों पर तो करोडों लीटर पानी का इस्तेमाल होता होगा लेकिन हरामखोरी की हद तब हो जाती है जब इसपर मुक दर्शक बने कथित पानी बचाओं संघटन होली मे कुछ हजार लीटर पानी की खपत पर विधवा विलाप करते हैं और क्रोध तो तब अधिक आता है जब ऐसे लोग इस भेडचाल वाली मुहिम मे शामिल हो जाते हैं जिनके खुद के बच्चे कई-कई दिनों पहले से होली-दिवाली-मकर संक्राँती मनाने के सपने सँजोये रखते हैं। कम से कम हिंदु सेक्युलर्स को तो इसके लिए शर्म आनी चाहिए।

          बुद्धीजिवी होने के नाते किसी भी चीज पर अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले पूरे तथ्य को जानें व सनातन हिंदु पर्व के आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता को समझकर पाश्चात्यिकरण व सर्वधर्म-समभाव वाली हिंदु-विरोधी मानसिकता का जमकर विरोध करें। लाखों सालों से मनाये जा रहे त्योंहारों की उपेक्षा कुछ सदि पहले पनपे विज्ञानरूपी गंदगी से ना करें। विज्ञान को जन्म ही सनातन हिंदु धर्म ने दिया है तो विशाल सनातनी परंपराओं को हौने विज्ञान से ना तौले।अपने आँख, कान, नाक खुला रखकर सोचे समझे व फिर अपनी प्रतिक्रिया दें।

         अंत मे केवल इतना ही कहुँगा की पूर्णत: वैज्ञानिक, Logical और धर्मनिरपेक्ष त्योहार मकर संक्राँती की सभी मित्रों को हार्दिक बधाई ! आप व आपका परिवार इस नव वर्ष प्रगती की नई सीढिंयाँ चढे यही  ब्रह्माँड नायक शिव की चरणों मे प्रार्थना....🙏
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