मकर संक्राँती और विज्ञान - News Beyond The Media House

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Wednesday, January 16, 2019

मकर संक्राँती और विज्ञान

मकर संक्राँती और विज्ञान

          हम अक्सर ये देखते व सुनते हैं की हिंदु त्योंहारों के पीछे पुराने भारतिय रूढिवादी परंपराएँ है और जिस वजह से आज का पढा-लिखा युवा भारतिय रिती-रिवाजों को अंधविश्वास कहकर उसे नहीं मानता। वहीं दुसरी तरफ यही युवा पश्चिम की संस्कृतियों को ऐसे अपना रहा है मानों वे उसकी प्रमाणिकता पर Research करके बैंठे हो। नवयुवक और नवयुवतियाँ Halloween, Thanks Giving Day, Christmas, New Year जैसे विदेशी त्योहारों को ऐसे उत्साह से मनाते हैं मानों ये उनका अपना ही पारंपरिक त्योंहार हो। वें इन त्योंहारों को मनाने का कारण या उद्देश्य भी नहीं जानते, बस Modern दिखना है तो पश्चिम के In Logical और Non Scientific त्योंहारों को मनाओं और बन जाओं Cool Dude....

खैर आज का ये Article पश्चिमों की अंधविश्वासी, In Logical और अवैज्ञानिक Western Cultures पर नहीं है। आज का लेख हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित महान पर्व मकर संक्राँती और उसके पीछे की वैज्ञानिकता पर है। आज हम इस लेख के माध्यम से मकर संक्राँती की महत्वता पर प्रकाश डालेंगे।


मकर संक्राँती के रिवाजों के पीछे की वैज्ञानिक सोच के उदहारण कुछ इस प्रकार से है :-

पवित्र नदियों में स्नान की वैज्ञानिकता :- जब सूर्य मकर राशी मे प्रवेश करता है तब प्रकृती मे सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है जिसे सनातन हिंदु धर्म मे देश के अलग-अलग भागों में मकर संक्राँती, उत्तरायण, खिचडी या पोंगल के रूप मे मनाया जाता है। इस समय दिन बडे व रात्री छोटे होने शुरू हो जाते हैं और इस खगोलिय परिवर्तन से पृथ्वी पर सूर्य की उष्णता मे बढोतरी होती है जिससे नदियों मे वाष्पिकरण की प्रक्रिया तेज होने लगती है। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार ऐसे वाष्पिकृत नदि के पानी मे डुबकी लगाने मात्र से शरीर के कई रोगों का नाश होकर तन व मन दोनों निरोगी बनते हैं। इसे आप "Natural Steam Bath" भी कह सकते हो। इसलिए हमारे पुराणों में प्रकृती के इस बदलाव में नदियों मे डुबकी लगाने का प्रावधान है। इस पावन अवसर पर हजारों सालों से श्रद्धालु इस त्योहार की वैज्ञानिकता को जानकर उसका लाभ लेने लाखों, करोडों की संख्या मे गंगा, यमुना सरस्वती जैसे पवित्र नदियों के तट पर स्नान करके शारीरिक व आध्यात्मिक लाभ लेने के लिए जुटते हैं। हरिद्वार, वाराणसी, हर की पौडी, प्रयागराज जैसे पौराणिक पवित्र स्थानों पर हजारों सालों से मकर संक्रांति के कुछ दिन पहले से ही लोगों का जमावडा शुरू हो जाता है जिससे इस अवसर पर हमारे महान संस्कृती की वैज्ञानिक सोच और विश्वास की भव्यता देखते ही बनती है।


मकर संक्राँती पर पतंगबाजी :- आज यदि किसी से ये सवाल पुँछ लिया जाए की मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने का क्या कारण है तब शायद ही कोई पढ़ा-लिखा इसका जवाब दे पाये। मैंने लोगों से कई बार पूँछकर देखा है और मुझे अक्सर ज्ञानचंदों से हमेशा से एक ही जवाब मिला कि, "त्यौहार होते ही खुशियाँ मनाने के लिए है इसलिए बच्चों की मौज-मस्ती के लिए ये परम्पराएँ चली आ रही होंगी।" किन्तु क्या वास्तव में ऐसा ही है ?

          सर्दी के दिनों में हमारे शरीर की त्वचा शुष्क होकर बेजान हो जाती है तो ऐसे में जब सूर्य उत्तरायण होकर अपनी जीवदायिनी किरणे सीधे पृथ्वी पर डालता है तब वो किरणे औषधिय गुणों से भरपूर हो जाती है तथा पतंग उड़ाते समय हम सीधे उन किरणों के संपर्क में आते हैं और खेल-खेल में हमारे त्वचा को पोषण मिल जाता है। इसके अलावा मनोवैज्ञानिक तौर पर भी पतंगबाजी हमारे मन में सकारात्मक असर छोड़ जाती है। आदिकाल से ही हमारे पूर्वज मन को तनाव मुक्त करने के लिए ध्यान, योग और तप जैसे आध्यात्मिक तरीकों को करते आये है। यह आध्यात्मिक एकाग्रता साधारण मनुष्य के लिए मुश्किल जानकार ही हमारे पूर्वजों ने पतंगबाजी जैसी भौतिक क्रिया से सर्व-साधारण जनों के लिए पतंग उड़ाकर तनाव मुक्ति का मनोवैज्ञानिक तरीका ढूँढ निकाला। 


इन सब बातों के अलावा यदि पतंगबाजी से शिक्षा की बात करें तो आसमान में ऊँची उड़ती पतंग हमें कुछ सीख भी देती है। आइये जाने पतंगबाजी से क्या शिक्षा मिलती है। 

  1. हम जीवन में चाहे कितना ही ऊँचा उड़े किन्तु हमें अपने उद्धगम स्थान को कभी नहीं भूलना चाहिए। जिस तरह पतंग आसमान की उचाईयों में पहुंचकर भी एक डोर के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है ठीक वैसे ही मनुष्य को भी कामियाबी के शिखर पर पहुँचकर भी संस्कार रुपी डोर से बँधकर अपनी संस्कृति से जुड़ा रहना चाहिए। यदि एक बार संस्काकर रुपी डोर टूटी तो मनुष्य का वही हाल होगा जो कटी पतंग का होता है। 
  2. पतंग खुले आसमान में अपने डोर के माध्यम से नियंत्रण में रहकर ये यह सन्देश देती है की हमें भी विश्व रुपी नभ में अपने पूर्वजों के संस्कार रुपी डोर के सहारे संतुलन बनाये रखना चाहिए। 
  3. अपने डोर से कटी पतंग द्वारा हमें ये शिक्षा मिलती है की, "यदि हम अपने संस्कार और परम्पराओं से कटे तो हम ऊपर तो उठेंगे किन्तु कहाँ जाकर गिरेंगे ये नहीं पता चलेगा।" इसलिए यदि जीवन में स्थिर होकर ऊँचाईयों को प्राप्त करना है तो अपनी परम्पराओं की डोर से जुड़े रहने की शिक्षा पतंग देती है।  
  4. पतंग कभी स्वयं के परिश्रम से आसमान की ऊँचाइयों में नहीं पहुँचती बल्कि उसे ऊँचाई तक पहुँचाने में पतंग को उड़नेवाला वह व्यक्ति होता है जिसकी सोच और प्रयासों से ही पतंग आसमान में उड़ती है। फिरकी का भी योगदान पतंग की उड़ान में महत्वपूर्ण हैं जिसमे डोर उलझे बिना सिमटकर पतंग को दिशा देती है। फिरकी से लिपटी डोर भी पतंग की ऊँची उड़ान के लिए बराबर जिम्मेदार होती है जो पतंग को मार्गदर्शन देकर संतुलित करती है तथा हवा भी पतंग को उड़ने के लिए गुरुत्वाकर्षण के विपरीत बल देती है। एक पतंग को आसमान तक पहुँचाने में इन सभी का हाथ होता है। ठीक इसी प्रकार यदि जीवन में ऊँचा उठाना है तो गुरु वो व्यक्ति है जो आपको निखारने का प्रयास करता हैं तथा पतंग उड़ाते हुए व्यक्ति की भाँति ही गुरु की सोच और प्रयास ही मनुष्य को यश दिला सकता है, समाज एक फिरकी है जिसमें सनातन परंपरा की संस्कारी डोर (माँजा) बिना उलझन के लिपटी है और अंत में सुअवसर एक प्रकार की हवा ही है जिसके माध्यम से आपको जीवन रुपी आसमान में ऊपर उठने का बल मिलता है। 
          इन सब के अलावा पतंगबाजी से दिमागी कसरत होकर अनिद्रा, डिप्रेशन जैसे रोगों से निजाद मिलती है। सीधे सूरज की किरणों के संपर्क में आने से शरीर को गर्मी मिलती है जिससे सर्दी, खाँसी और जुखाम जैसे मौसमी बीमारी अपने आप ही ठीक हो जाती है। हम पतंग दोस्तों और यारों के साथ मिलकर उड़ाते हैं जिसमे कोई फिरकी थामता है तो कोई डोर और इस तरह की जुगलबंदी से हमें एकता का संदेश मिलता है। इसके साथ-साथ पतंग को कटने से बचाने के लिए मित्रों से तालमेल बैठाकर हमें सामाजिक जुझारूपन भी सीखने और सिखाने का भी मौका मिलता है। तो इस प्रकार से पतंग उड़ाने के पीछे कई सकारात्मक मनोवैज्ञानिक कारण है। 

खिचड़ी बनाने की प्रथा :- खिचड़ी का आविष्कार भगवान शिव के अंश बाबा गोरखनाथ ने भूतकाल के "गोरक्षक प्रांत" में किया था जो वर्त्तमान`में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हिन्दू हृदय सम्राठ माननीय श्री योगी आदित्यनाथ जी की चुनावी नगरी "गोरखपुर" के नाम से प्रसिद्ध है। इसलिए उत्तर प्रदेश में मकर संक्राँती को "खिचड़ी पर्व" के नाम से भी जाना जाता है। दुष्ट खिलजी से युद्ध के समय भोजन बनाने के समय को बचाने और युद्ध कर रहे नाग साधुओं के शरीर को पोषण देने के लिए बाबा गोरखनाथ ने नाग साधुओं को दाल , चावल और सब्जी अलग-अलग ना पकाकर एक साथ पकाने का निर्देश दिया और इस प्रकार बाबा गोरखनाथ ने इस स्वादिस्टऔर पौष्टिक व्यंजन को खिचड़ी नाम देकर प्रचलित किया। ये तो रही धार्मिक मान्यता, अब देखते हैं खिचड़ी के औषधिय और वैज्ञानिक पहलुँओं को। अक्सर हम बिमारी में डॉक्टर से खिचड़ी खाने की सलाह सुनते है, क्योंकि डॉक्टर को ये पता होता है की खिचड़ी प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट और ऊर्जा से भरपूर होती है और रोगी के कमजोर हो चुके पाचनतंत्र के लिए सुपाच्य भी होती है। इसके सेवन से आंते साफ होकर रोगी को शरीर से विषाक्त पदार्थ (Toxins) को बाहर निकालने में सहायता मिलती है। सुपाच्य होने की वजह से बच्चे और बूढ़े दोनों इसका सेवन कर सकते हैं। खिचड़ी के वात, पित्त और कफ को संतुलित करने की क्षमता के कारण आयुर्वेद में खिचड़ी को त्रिदोषिक आहार कहा गया है। 

तिल गुड़ घ्या आणि गोड-गोड बोला :- चरक संहिता में उत्तरायण के समय शीत के कारण शरीर में उत्पन्न व्याधियों एंव उसके निवारण के लिए एक श्लोक लिखा गया है। यहाँ मैं उस श्लोक और उसके अर्थ को प्रस्तुत कर रहा हूँ।  

शीते शीतानिलर्स्पषसंरुद्धो बलिनां बली। रसं हिन्स्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रयुप्यति।।

इस श्लोक काअर्थ यह है की इस ऋतू में ठंड से शरीर की रक्षा के लिए घी अथवा तेल, तिल, गुड़, गन्ना, धूप और गर्म पानी का सेवन करना चाहिए। 

आइये देखते है की इसके अलावा और क्या फायदे है तिल और गुड से बने लड्डू के 

  1. तिल के लड्डू में त्वचा, हृदय और बालों के लिए लाभकारी वसा (Good Fats) प्रचुर मात्रा में  पाया जाता है।  
  2. तिल के लड्डू में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स तत्त्व ना केवल सर्दी, खाँसी जैसी सर्दियों में होनेवाले मौसमी बीमारियों से लड़ने की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं बल्कि शरीर को भरपूर मात्रा में आयरन देकर रक्त की कमी को दूर करते हैं और ठंड के मौसम में खून की कमी से होनेवाले रोग एनीमिया होने से भी बचते हैं। 
  3. तिल में तेल की प्रचुरता होती है तथा गुड़ की गर्म तासीर के कारण तिल और गुड से बने लड्डू ठंड के मौसम में शरीर को गर्माहट देते हैं।  
  4. कडाके की ठंड के कारण शरीर की चयपचय की क्रिया मे गडबडी होने से पाचन शक्ति धीमी हो जाती है। फाइबर युक्त तिलगुड मंद पडे पाचन क्रिया को दुरूस्त करके हाजमा ठिक करता है।
  5. ठंड के मौसम मे यदि उचित पोषण मिले तो शरिर का विकास शीघ्रता से होता है। तिलगुड के लड्डू में कई प्रकार के प्रोटीनों, कार्बोहाइट्रेड, वसा, फाईबर्स, कैल्शियम, कॉपर, मैग्नीज, मैग्नीशियम, आयरन, ग्लूकोज, फास्फोरस, जिंक, बी काम्‍प्‍लेक्‍स, ट्राइयोफान आदि पोषक तत्त्व होता है जिसके सेवन से स्वास्थ्य लाभ होता है।
  6. गठिया रोग मे तिल का सेवन रामबाण का काम करता है।

इन सब के अलावा मकर संक्राँती के अन्य धार्मिक एंव आध्यात्मिक महत्व भी है, किंतु लेख के काफी लंबे होने के कारण हम फिर कभी उसकी चर्चा करेंगे।

Know more on this topic by clicking on "मकर संक्राँति पर कबूतरबाजी"


  

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