नरेंद्र मोदी की विफलता ? क्या रहीं पाँच राज्यों मे बीजेपी की शर्मनाक हार की वजह ? - News Beyond The Media House

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Monday, December 17, 2018

नरेंद्र मोदी की विफलता ? क्या रहीं पाँच राज्यों मे बीजेपी की शर्मनाक हार की वजह ?

चुनाव मंथन 


            काफी समय से चर्चा का विषय रहा है की २०१४ के आम लोकसभा चुनाव मे बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के चेहरे की रेस मे लालकृष्ण आडवानी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और नरेंद्र मोदी का नाम सामने था, लेकिन गुजरात मे लगातार चार बार सरकार बनाने में सफल एंव २००२ के दंगों के बाद से बने कट्टर हिंदुवादी छवी के कारण प्रधानमंत्री पद की रेस मे नरेंद्र मोदी को वरियता दी गई और बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को जनता मे वोट बैक के रूप मे भुनाने के लिए बीजेपी के बैनर पर मोदी जी की फोटो प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनी। "अबकी बार मोदी सरकार" का नारा जोरों-शोरों पर लगाया गया। नरेंद्र मोदी की कट्टर हिंदुत्व छवी एंव अमीत शाह एंड कंपनी की रणनीती के बल पर बीजेपी ने २०१४ के आम लोकसभा चुनाव मे बाजी मारी और जो पहले कभी ना हुआ वो पहली बार हुआ। लालकिले से भारत को एक नया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप मे मिला।
            एक आम बालक और एक आम चाय बेचनेवाले से लेकर भारत के प्रधानमंत्री तक का सफर तय करने का नया इतिहास लिखा जा चुका था। मोदी लहर ऐसी उठी की विरोधियों को मकान-दुकान समेत उखाड ले उडी। मोदी नाम की सुनामी ऐसी आई की गुट-गुट के विरोधी खेमें आँधी मे उडने से बचने के लिए एक-दुसरे का हाथ थाम बैठे। भारत मे ऐसा पहली बार हुआ की सारे विपक्ष एक साथ थे और सत्ता पर काबिज एकछत्र शासक से अपने अस्तित्व के लिए लड रहे थे। लेकिन सदियों की परंपरा रही है की इतिहास अपने आप को दोहराता है और इस बार भी होना यही था। मोदी लहर के अहम मे बीजेपी ऐसी डूबी की अपने कर्तव्य, धर्म सब को दरकिनार कर उसी राह पर चल पडी, जिस राह की कभी वो खुद विरोधी हुआ करती थी। बीजेपी को विकास का ऐसा नशा चढा की जिन हिंदुओं के बल पर उन्होने सत्ता की शराब पी उन्ही हिंदुओं की उपेक्षा कर बैठी। मुस्लिम तुष्टीकरण का कार्ड ऐसा खेला की स्वयं को मुसलमानों का पार्टी तक घोषित कर देनेवाली काँग्रेस तक को तुष्टीकरण मामले मे पीछे छोड डाला। अल्पसंख्यकों के वोट बटोरने का लालच और धर्मनिरपेक्षता का बुखार ऐसे माथे चढा की अपनी ही जड़ो को खोद बैठी।
            बीजेपी ने स्वयं को सेक्युलरता और विकास-पुरूष के आधुनिक लिबादे मे ऐसे ओडा की उसके दामन पर समुदाय-विशेष के तुष्टीकरण, हिंदु उपेक्षा, राममंदिर विफलता, गौहत्या, धर्म-द्रोह, राफेल विमान भ्रष्टाचार जैसे दाग लग गये। यदि छोटे मे कहे तो बीजेपी हर मुद्दों पर युटर्न लेती नजर आई। आईये बीजेपी हार के मुख्य कारणों पर विस्तार से नजर डालते हैं जो ना केवल हमारे लिए जानना आवश्यक है बल्की २०१९ मे सुधार के लिए बीजेपी को भी समझना आवश्यक है। विरोधी एंव २०१९ मे बननेवाली किसी भी सरकार को ये सारे मुद्दे पथ प्रदर्शक है जिसपर चलकर ही आनेवाले अगले कई दशकों तक कोई सरकार बनेगी भी और लंबी पारी खेलेगी भी।




राजनीतिक वजह

            गौरतलब है की बीजेपी मे प्रधानमंत्री पद को लेकर काफी सारे सक्षम दावेदार है और मोदी को वरियता दिए जाने से पार्टी मे अंर्तद्वंद की स्थिती उत्पन्न हुई है। हालॉकी मोदी जी ने अपने उम्दा प्रदर्शन एंव लोकप्रियता को ५ वर्षों तक लगातार बरकरार रखने के लिए एडी चोटी का जोर लगाया और काफी हद तक उसमे खरे भी उतरे हैं। किंतु सत्ता का नशा होता ही ऐसा है की काबिलियत और लोकप्रियता को लील ही लेता है। यहाँ पर भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। निंदाधीश राजनाथ सिंह का सरकार के कामकाज मे उदासिन व निंदनीय भूमिका, सुषमा स्वराज का अनस-सादिया पासपोर्ट मामले मे गैर जिम्मेदाराना रवैया, राजस्थान चुनाव मे अपने विरोधी वसुंदरा राजे के प्रचार के पक्ष मे मोदी-शाह की कथित योजनाबद्नध निष्क्रियता, मणिशंकर अय्यर व सत्रुघ्न सिंन्हा की बेबाकी, नितीश कुमार व शिवसेना जैसी सहयोगियों का असहयोग और नवज्योतसिंह सिद्धु जैसे मौकापरस्कीतों की  बगावत आदि बातों ने बीजेपी के भीतरी कलह को बखूबी दर्शाया। इन सब मे मोदी जी का व्यक्तिगत प्रदर्शन एंव अमित शाह की रणनीती को छोड दिया जाए तो बाकी सारी बाते बीजेपी की हार की राजनीतिक वजहें मानी जा सकती है।

मुख्य महत्वपूर्ण कारण  

१) नोटा  :- हिन्दुओ का रोष नोटा के रूप में सोशल मीडिया पर काफी trending रहा।  #नोटा कई फेसबुक पोस्टो पर, ट्विटर के ट्वीट्स पर  व WhatsApp पर काफी शेयर किये गये।  मैंने भी बाकायदा सरकार को पत्र लिखकर व अपने BLOG के जरिये #अबकी बारी नोटा भारी को काफी TREND  करवाया। यदि चुनावों के नतीजों पर गौर करे तो जहाँ एक तरफ बीजेपी और कांग्रेस के वोटो में जितना अंतर था उतनी ही संख्या नोटा का विकल्प चुनने वालों  की थी बल्कि नोटा को गए वोट उस से कुछ ज्यादा ही थे और इसलिए यहाँ पर ये मानने का कोई कारण ही नहीं मिलता की नोटधारी बीजेपी के खेमे से छानकर आये थे और जो शत-प्रतिशत सवर्ण हिन्दू थे और केवल मोदी सरकार की सवर्णो की उपेक्षा से असंतुष्ट थे। इसलिए NEWSUMPIRE.COM की ये Servey Report के अनुसार पाँच राज्यों मे बीजेपी की एक साथ करारी हार मे #नोटा का विकल्प सभी मुख्य करणों मे से सबसे प्रथम एव महत्वपूर्ण कारण रहा।
२) राम मंदिर :- लंबे समय से राम मंदिर भारतिय राजनीती के केंद्र बिंदु मे रहा है। राम मंदिर का पन्ना इतिहास मे बाबर के जमाने से चलकर भूतकाल के अटल-आडवाणी से लेकर वर्तमान में अब मोदी युग मे भी यथावत मुख्य मुद्दा बना हुआ है। बाबर के समय से कई राजा-महाराजाओं, वीरपुरुषों, साधू-संतो व सिक्खों ने राम मंदिर के निर्माण में अनेको सार्थक प्रयास किये और मदिर भी बना पाए किन्तु उनकी ये विजय लम्बे समय तक नहीं रही। कभी जीत राम मंदिर के पक्षकारो की हुई तो कभी जीत विपक्षकारो की हुई। लेकिन आज़ादी के बाद विभाजन हुआ और ऐसा लगा की मुसलमानों को जो चाहिए था वो पाकिस्तान और बांग्लादेश के रूप में उनको मिल गया और अब पूर्ण भारत पर हिन्दुओं  का एकाअधिकार होगा तथा राम मंदिर बनकर ही रहेगा। किंतु कांग्रेस की हिन्दुओं के प्रति अनदेखी और मुसलमानों की कभी समाप्त न होनेवाली माँगे एंव धरती के हर भाग को अपने बाप की जागीर समझने की कुरानी-प्रवृती के चलते स्वतंत्र भारत में भी राम मंदिर न बन पाया। दशकों के संघ के प्रयास के कारण भारत की राजनीती को एक दूसरा पक्ष जनसंघ के रूप में मिला जो आगे चलकर बीजेपी बना। ये दूसरा पक्ष बना ही हिंदुत्व के एजेंडे पर था।  लालकृष्ण आडवाणी जो की बीजेपी की तरफ से "राम मंदिर निर्माण आंदोलन" के पोस्टर ब्वॉय बनाकर उभरे और जिनके सफल प्रयासों के कारण ही बीजेपी अटल बिहारी जी के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बना पायी।
            वो दौर कुछ और था जब जनता को समाचार केवल अखबारों व रेडिओ के माध्यम से प्राप्त होते थे तथा साड़ी खबरे शत्-प्रतिशत पैसों के दम पर व विशेष उद्देश्य से लक्षित होती थी। इन्ही खबरों के बल पर उस दौर में नए-नए धर्म बने, बॉलिवुड द्वारा सेकुलरता व इस्लाम-परस्ती का धीमा जहर हिन्दुओं की नसों में घोला गया। ये वो दौर था जब बहुतेरे साई बाबाओ का उदय हुआ और राम के भक्तों को बरगलाकर तोड़ा गया व विधर्म की तरफ मोड़ा गया। राम-भक्त दलितों, बौद्धों, साई भक्तों व अनेकों स्वघोषित महापुरुषों के चलो में बिखरते गए जिसके परिणाम स्वरुप राम-भक्तों के स्थान पर साई-भक्तों, नितकारी-भक्तों, फलाना-भक्तों, ढिमकाना-भक्तों आदि आदि का जन्म हुआ एव जिसके कारण राम मंदिर निर्माण की शक्ति क्षीण हुई। फिर आया नरेंद्र मोदी का दौर ! कथित २००२ दंगो के कारक, कट्टर हिन्दू नेता नरेंद्र मोदी का दौर! पूर्ण हिन्दू बहुमत वाली सरकार का दौर! वो दौर जिसमे मंदिर का बनना तय माना जा रहा था। किंतु इस बार भी वही हुआ जो सदियों से होता चला आ रहा था। पिछली बार की तरह इस बार भी हिन्दू छला गया ! खेल गया वो हिन्दुओं की भावना से जिसको हिन्दू अपना मसीहा समझ बैठा था और इस बार भी मंदिर नहीं ही बना !
            आज मंदिर का मुद्दा टेक्नॉलॉजि की वजह से अलग ही रूप ले चुका है। जो मुद्दे संदेशवाहको, अखबारों व मिडिया तक सिमटकर बाहुबल एंव धन से प्रभावित होते थे अब तकनीक के युग मे सोशल मिडिया ने इन मुद्दों को पारदर्शिता दी है। लोगों की समझ मे ये बात आ चुकी थी कि, मंदिर बनना ही होता तो बीजेपी की "अटल बिहारी सरकार" मे ही बन चुका होता। नोटबंदी, SCST Act, ट्रिपल तलाख जैसे साहसपूर्ण व तानाशाही फैसले लेनेवाली मोदी सरकार का राम मंदिर पर रक्षात्मक फैसले लेने का कोई औचित्य बनता नहीं दिखता रहा था।जनता ये समझ चुकी थी की एक तरफ सरकार के मंदिर निर्माण के लिए अदालत पर निर्भरता किंतु दुसरी तरफ SCST Act पर अदालत के फैसलों को ही लताडकर उसके विरूद्ध अध्यादेश लाने का मतलब ही है की कथित हिंदुवादी बीजेपी सरकार ही ये चाहती है की राम मंदिर ना बने। इसलिए यहाँ पर ये कहना गलत नहीं होगा की पाँच राज्यों मे एक साथ करारी हार मे राम मंदिर का ना बनना सभी कारणों मे से सबसे प्रथम एव महत्वपूर्ण कारणों में से एक है।

३) साधू संतो का अभिषाप :- २०१४ के लोकसभा चुनाव में राम राम मंदिर के पक्षकार संत-समाज ने खूब जोरो शोरो से बीजेपी का प्रचार किया।  रामदेव बाबा जैसे दिग्गज तक कालाधन को लेकर बीजेपी के घोषणापत्रों के समर्थन में उतर आये। आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंगदल व इनके जैसे अनेको हिन्दू संघटनों ने बीजेपी के लिए बिना किसी सत्ता लोभ व लालच के जमीनी स्तर पर प्रचार किया। इन्ही तीसरे स्तंभ की बदौलत मिले सिंहासन पर बैठकर कतिथ हिंदूवादी सरकार ने अपने इन्ही हिन्दू हितैषियों की घोर उपेक्षा की। राम मंदिर, कालाधन, धरा-३७०, अनुच्छेद ३५-अ, पकिस्तान-समस्या, जनसँख्या नियंत्रण कानून, इस्लामिक-जेहाद व आतंकवाद जैसी गंभीर समस्या में किसी एक पर भी ठीक से कार्यवाही नहीं हुई और पांच साल युँही निकल गए। इतने से काम ना चला तो बीजेपी के कट्टर हिंदूवादी छवि के नेता योगी आदित्यनाथ जी का हिन्दू देवता महावीर बजरंगबली को दलित कहनेवाला विवादित बयान और कई अन्य बीजेपी नेताओ के हिन्दू देवताओं को लेकर जातिसूचक बयान आदि ने आग में घी का काम किया। पूरा साधू समाज इस बात का विरोध करता रहा किन्तु बीजेपी के कानो में जूँ तक न  रेंगी। इन सब के बीच सरकार द्वारा हिन्दू मंदिरो का ध्वस्तीकरण, साई बाबा व उस जैसे अन्य इस्लामी दुष्ट व धूर्तो की मज़ारों  पर मत्था फोड़कर ईस्लाम का प्रचार-प्रसार आदि बांटों ने साधू-संतों और अन्य कट्टर हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।  सरकार की इन सब हिन्दू-विरोधी क्रिया की प्रतिक्रिया #नोटा के रूप में हुई।
४) घोर मुस्लिम तुष्टीकरण :- एक जमाने से मुसलमान वोट कांग्रेस का लिखित वोट बैंक रहा है व बीजेपी के रणनिती कारकों को ऐसा लगने लगा था की मरणासन्न काँग्रेस को २०१९ के चुनावों मे यदि कोई जीवनदान दे सकता है तो वो मुस्लिमों के वोट ही है। मुसलमानों के इसी वोट बैंक पर सेंध लगाने के उद्देश्य से बीजेपी लगभग पिछले साढे चार सालों मे मुस्लिम-तुष्टिकरण के वो सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले जिनको तोड़ने का साहस कांग्रेस भी जूता ना पाई थी। अल्पसंख्यकों के लिए १५ सूत्रिय कार्यक्रम,पर बीजेपी सरकार देश का खजाना लुटा चुकी थी  और दुसरी तकफ देश के बहुसंख्यक हिंदु युवाओं की शिक्षा, रोजगार जैसे मूलभूत मुद्दों पर पकौड़े बिकवाती रही। तो यहाँ पर इस बात पर कोई दो राय नहीं की घोर मुस्लिम-तुष्टीकरण के कारण बीजेपी को चुनावों मे पाँच राज्यों से हाथ धोना पडा।
{अल्पसंख्यकों के लिए १५ सूत्रिय कार्यक्रम देखने के लिए यहाँ पर click करे}

५) SCST Act :- सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाती व अनुसूचित जनजाति अधिनियम १९८९ (Scheduled Castes and Scheduled Tribes Act) के अनुसार शिकायत के तुरंत बाद मुक़दमा दर्ज करने व बिना जाँच के किसी भी गैर अनुसूचित जाती या जनजाति के सवर्णो को अपराध साबित किये बिना जेल की बात पर उच्च न्यायलय ने सवाल खड़े किये थे साथ ही ये भी कहा था की यदि जाँच की आवश्यकता पड़ी तो वो जाँच भी ७ दिनों से अधिक नहीं चलनी नहीं चाहिए और आरोपी पक्ष को भी अग्रिम जमानत की सहूलियत की बात कही थी। उच्च न्यायलय के SCST Act-1989 पर किये संशोधन पर बीजेपी ने अध्यादेश लाकर अदालत के फैसले को पलट दिया और मुश्किल से सदियों बाद एकजुट हुए हिन्दुओ को पुनः जातिवाद के कुए में धकेल दिया। बीजेपी के अनुसूचित जाती व अनुसूचित जनजाति के वोटरों को खुश करने  गए जातिवादी कूटनीति से सवर्णो को काफी धक्का लगा। यदि आँकड़ों पर गौर करे तो लगभग १२ प्रतिशत ब्राह्मण, १० प्रतिशत राजपूत समेत ४ से ५ प्रतिशत में ठाकुर, यादव, बनिए व अन्य ऊँचे तबके के लोग आते हैं और जिनको यदि वोटो में तोला जाये तो २५ प्रतिशत से कम का जनादेश नहीं मिलेगा। अब जब इतने बड़े तबको को नाराज करोगे तो भैया हार तो निश्चित ही हैं।

६) गौहत्या :- एक तरफ गौ जैसा सीधा व सरल प्राणी हिन्दू कांग्रेसियों की कल्पित जाल भगवा आतंकवाद की हिन्दू विरोधी षड़यंत्र की मार झेल ही रहा था की हिन्दुओ के जान से अजीज़ प्यारे प्रधानमंत्री जी ने गौरक्षकों को गुंडा कहकर अपमानित किया।  इस बात में कोई दो राय नहीं की किसी को भी क़ानून हाथ में लेने का कोई अधिकार नहीं और गाय बाद में हैं और पहले मनुष्य ही है ! किन्तु प्रधानमंत्री जी को अपने पद की गरिमा को बनाये रखनी थी और यदि प्रधानमंत्री खुले मंच से इस्लामिक-आतंकवाद या फिर इस्लामिक-जेहाद जैसे शब्द का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं कर सकते क्यूंकि उस से मुठीभर अल्पसंख्यकों की भावना आहात हो सकती है तो एकाध गौरक्षको के भेस में कतिथ दबंगो के हुड़दंड के कारण सभी गौरक्षको को गुंडा कहना भी बहुसंख्यको की भावना वोट के रूप में आहत कर गया और बीजेपी को पॉंचों  राज्यों में करारी हार दे गया।
७) पैगाम-ए-इस्लाम :- रेंद्र मोदी पिछले इस्लाम को लेकर अपने यूटर्न लेकर ४-५ महीनो से काफी  रहे।  व‌र्ल्ड सूफी फोरम' के उद्घाटन में मोदी जी ने सूफी विउचार को आतंकवाद पर मात मानी और बढ़ाते आतंकवाद में इस्लाम में सूफी की महत्वता को और बाद जाने की बात कही। मोदी जी ने इस मंच से सूफी विचार को आतंकवाद का विरोधी बताया और इतना ही नहीं इस्लाम को शांति का मजहब तक कह बैठे और नए-नए मिले ब्रह्मा ज्ञान का परिचय देकर इस्लाम का शाब्दिक अर्थ शांति होता हैं यह खोज निकला। मोदी जी के खरीदे नए शब्दकोश में अल्लाह के ९९ नामो में पहले दो नाम रहमान और रहीम का अर्थ करुणा और दया था। मोदी जी विश्व की सबसे बड़ी तीसरे नंबर की अबू धाबी स्थित मस्जिद के विजिटर्स बुक में इस्‍लाम शांति और सद्भावना का प्रतीक हैं ऐसा दर्जा किया। अब कट्टर हिंदूवादी नेता एक तरफ हिन्दुओ को SCST Act लगाकर जातिवाद में बाँटे, गौभक्तो को गुंडा कहे और इस्लाम के तारीफों के पुलंदे बाँधे तब लो वोट मुसलमानो से, हिन्दू तो वोट देने से रहे भैय्या।

८) IPC Section 377 and Section 497 :- धरा ३७७ की समलैंगिक सम्बन्ध व धरा ४९७ की विवाहोपरांत अनैतिक सम्बन्धो को अपराध की श्रेणी से बहार निकालने के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का कई हिन्दू संघटनो ने विरोध किया और देश का एक बहुत बड़ा हिन्दू वर्ग ये चाहता था की कथित हिंदूवादी मोदी सरकार अदालत के इस वामपंथी विचारधारावाली धर्म-विरोधी फैसले के विरोध में अध्यादेश निकाले । किन्तु SCST Act पर जाति की राजनीति करके अध्यादेश लानेवाली सरकार ने अदालत के इस कामुक-आदेश को मौन सहमति दी जिसके कारण सनातनी-आस्था रखनेवाले वोटरों का वोट पाँचों राज्यों में बिखर गया। 


९) कश्मीर समस्या :- अनुच्छेद ३-अ, धरा ३७०, आतंकवाद, पत्थरबाज, पकिस्तान, मरते सैनिक आदि ऐसी समस्या हैं जिसका समाधान यदि सरकार चाहे तो बड़ी ही आसानी से कुछ महीनो में ही हूो सकता है। भारत के पास धनबल, सैन्य बल, आधुनिक हथियार, विदेशी सहायता, जनता का साथ सब कुछ प्रचुर मात्रा में है। यदि कुछ नहीं हैं तो केवल साफ-सुथरी एव वोट की राजनीति से परे इस्लाम से निडरता के साथ टक्कर लेनेवाली नेतृत्वा छमता नहीं है।  कश्मीरी पंडितो की हृदय को पीड़ा देनेवाली उलझन हैं की किसी शतरंज की चाल जो सुलझाकर घर वापसी का नाम ही नहीं ले रही ? जाने क्या होगा उनका ये सोचकर कईयो के तो वोट भी ना पड़े। 
 


१०) घुसपैठ :- बांग्लादेशी, नेपाली क्या काम थे जो हिन्दुओ का माँस खानेवाले आदमखोर रोहिग्या-मुसलमान भी छथि थूक कर देश में रहने लगे है।  देश में तो जैसे अराजकता का माहौल है, कोई भी मुँह उठा के चला आता हैं, कोई भी बेम गिरा कर बैंको से पैसे लेकर भाग जाता है। देश हैं की कबूतरखाना ? देश का एक बहुत बड़ा बुद्धिजीवी और पढ़ा-लिखा तबका बारीकी से सबकुछ देख रहा हैं और बदलाव चाहता है। पाँचों राज्यों की चुनावी हार इसी बदलाव का नतीजा है। 

११) राफेल का भूत :- हालाँकि राहुल गाँधी का राफेल विमान के भ्रस्टाचार का मामला एक फुसकी-बम निकला लेकिन साथ ही साथ ये भी मानना पड़ेगा की नरेंद्र मोदी जैसे साफ छवि वाले बड़े कद के नेता को एक राजनितिक-विदूषक ने सफाई देने और रक्षात्मक शैली अपनाने पर मजबूर कर दिया। राहुल गाँधी एंड कंपनी ने राफेल भ्रस्टाचार को ऐसी हवा दी की पहले तो लगा की केवल धुँआ ही निकलेगा और राहुल उस धुए में खुद का एव पूरी कांग्रेस का दम घोंट बैठेगा किन्तु राहुल ने इस आग को लगातार हवा दी और उनके सहयोगियों ने केवल चाटुकारिता के वशीभूत उस आग में ईंधन देने का काम किया जिससे जनता के मन में भ्रस्टाचार की बात घर कर गयी।  हालाँकि इस बात का वोटरों पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा किन्तु कहते हैं ना की बून्द-बून्द से ही सागर बनता हैं और राहुल सागर में से कुछ बुँदे ले ही गया, जिसके पाँच राज्यों के चुनावों के नतीजों में साफ देखने को मिले। इस बात में कोई दो राय नहीं की राफेल का भूत २०१९ के आम लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी को डरानेवाला हैं।  


          न सब के अलावा कहीं ना कहीं नोटेबंदी और GST की मार से ठप्प पड़े धंधे, बेरोजगारी, किसानो की समस्या, आधार कार्ड, पासपोर्ट, वोटर आयडी, राशन कार्ड  समेत अन्य दस्तावेजों की मगजमारी, कालाधन, १५ लाख, प्रधानमंत्री आवास योजना आदि जुमले भी बीजेपी के हार का कारण रहे। २०१९ बीजेपी के लिए काफी चुनौती लानेवाला है और जिससे बीजेपी यदि पार पाना चाहती हैं तो अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर रहकर ही पा सकती हैं। अब देखना ये हैं की बीजेपी वापस हिंदूवादी विचारधारा अपनाती हैं या नहीं या सेक्युलर बनकर जातिवाद और मुस्लिम-तुष्टिकरण की गन्दी राजनीति ही करती हैं। 



















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