शौचालय का प्रेत भाग - ३ - News Beyond The Media House

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Tuesday, December 4, 2018

शौचालय का प्रेत भाग - ३

            उस घटना को काफी दिन बीत चुके थे और मैं पूरी तरह से उस बात को भूल चुका था। लगभग २-३ महिनों के बाद एक दिन मैं पुन: Morning Shift कर रहा था। हाँलाकी हमेशा की तुलना में उस दिन काम तो ज्यादा नहीं था और Staffing भी इतनी थी की मैं Store Manager होने का फायदा उठाकर समय पर या उससे पहले भी निकल सकता था, आखिर मुझे पूछनेवाले मेरे बॉस केवल एक ही तो थे और वे थे मेरे Area Manager, जिन्होंने कई बार अचानक Visit करके ये जाँच की थी की मैं काम पर से गुठली मारकर गायब तो नहीं रहता ? कई बार के आकस्मिक Visits के अनुभव से उन्हे ये पता चल ही चुका था की काम पर से गुठली मारकर गायब होना मेरी आदत नहीं। आजकल उन्होने मेरा काम का Schedule Check करना भी लगभग-लगभग छोड ही दिया था। मेरी अनुपस्थिती मे वे जब भी आते तो किसी Staff से शंका से केवल पुँछते की विकास कहाँ है और Staff  के किसी भी जवाब (भले ही वो मेरी तरफदारी मे दिया गया जवाब हो ) मान ही लेते थे। इतनी सुविधा होने पर भी मैं ८-९ बजे ही निकलता और वही मेरे लिए मेरा जल्दी निकलना था। उस दिन भी ८ तो बज ही चुके थे और पता नहीं क्यों उस दिन मैं ३-४ बजे ही Handover भी दे ही चुका था तो आज रोज की तरह मुझे निकलने के लिए कुछ खास समय नहीं लगनेवाला था। मेरा घर जाने का मूड हुआ तो मैं जल्दी से अपना सामान समेटने लगा और अगले दिन मेरी छुट्टी होने की वजह से मेरी अनुपस्थिती पर मेरे Assistant Manager  को कुछ जरूरी निर्देश दिये और बैग उठाकर चल पडा। चुँकी दुसरे दिन मेरी छुट्टी तो थी ही तो मेरा घर पर इतनी जल्दी पहुँचना माँ की लिये आश्चर्य था और मेरे लिए कानूनन जूर्म था, सो मैंने सोचा क्यों न चाय की टपरी पर चलकर चाय पी जाएँ। पर मैंने सोचा क्यों ना इस बार सीधे घर पर भाईंदर पहुँचकर ही चाय पी ली जाएँ और भाईंदर के कुछ मित्रों से मिल भी लिया जाएँ। इतने मे प्रफूल आया और मुझे उसके साथ वही टपरी पर एक-एक चाय पीने की जिद करने लगा। मेरे लाख मना करने पर भी वो अडा रहा और न माना तो मैंने भी सोचा की क्या फर्क पडता है ? मुझे तो कोई समस्या ही न थी और यदि छुट्टी नहीं भी होती तब भी मेरे शब्दकोश मे देरी और वही के लिए नहीं नाम का शब्द तो था ही नहीं, सो तय किया की एक चाय प्रफूल के साथ हो ही जाएँ उसके बाद चलेंगे भाईंदर। लेकिन मुझे जल्दी-जल्दी चाय पीकर प्रफूल को निपटाना था क्योंकी जल्दी नहीं की तो कईं दुसरे टिपय्ये आ पहुँचेंगे और १०-११ यही बज जायेंगे। भाईंदर मे दस सवा दस  बजे तक ही चाय की दुकाने चालू रहती है इसलिए देर हुई तो भाईंद की चाय सीधे अगले हफ्ते की Weekly Off पर चली जाती जैसा मैं कतई होने नहीं देना चाहता था। मैं और प्रफूल वहीं पिछली बार वाली चाय की टापरी पर चाय पी रहे थे जो Main Road पर बस स्टॉप के पास थी।


           मैं ये सोचकर जल्दबाजी मे प्रफूल के साथ चाय पीने की औपचारिकता निपटा रहा था कि यदी कोई गोरेगाव की बस आये तो मैं उसे बस स्टॉप से पहले ही सडक पर पकड लूंगा। मैं योजना बना ही रहा थी की सामने से कुछ बसें आई जिन्हे देखकर मैं भगवान से ये प्रार्थना करने लगा की उनमे से कोई एक बस गोरेगाँव स्टेशन के लिए हो। कुल ५-६ बस एक के बाद एक कतार बनाकर आ रही थी और ओशिवरा के तारापुर चौक के सर्कल पर की चाय की टपरी के यहाँ Signal की वजह से सारी बसे या तो रूक ही जाया करती थी या तो धीमी हो जाया करती थी। मैंने सारी बसों का फलक ध्यानपूर्वक देखा लेकिन उनमे से गोरेगाँव स्टेशन के लिए एक भी बस नहीं थी किन्तु सबसे अंत मे जो बस आ रही थी वो जोगेश्वरी स्टेशन जानेवाली थी। मैं सोच रहा था की जो बस मिले वही सही किंतु पहले यहाँ से किसी भी रेल्वे स्टेशन पहुँचना जरूरी है बाकी फिर वहाँ से जैसे-तैसे घर पहुँच ही जायेंगे। मैं अपने दिमाग मे बस से जोगेश्वरी स्टेशन जाने, फिर ट्रेन पकडने और भाईंदर पहुँचकर चाय पीने और देर तक नुक्कड पर दोस्तों से बतियाने की गणना कर ही रहा था की प्रफुल ने मेरे मन की बात भाँप ली और समझ गया की मैं कन्नी काटने के फिराक मे हुँ। प्रफूल मेरे मन की बात बिन बोले समझ ही जाया करता था, अचानक उसने मेरा बैग पकड लिया और मस्ती के मूड मे मुझे पकड कर रोकने की कोशीश करने लगा लेकिन जब मैं भडकने लगा तो उसने भी तुरंत छोड दिया क्योंकी मेरे भडकने का खामियाजा वो पहले भी कई बार भुगत चुका था। उसे पता था की यदि मेरी बस छुटती है तो अगले दिन काम पर उसको इसका खामियाजा भुगतना ही पडेगा, सो उसने बिना Risk लिए मुझे जाने दिया। इस से पहले "तारापुर चौक" पर Signal लाल से हरा हो और मुझे चलती बस पकडने की जद्दोजहज करनी पडे मैं बिना चाय के पैसे दिए बस की तरफ लपका। चायवाला तो मेरे जान पहचान का था और उसे हमेशा पता रहता था की यदि बस आई तो मैं बिना चाय के पैसे दिए निकल जाऊँगा और पैसे अगले दिन आकर स्वयं चुका दुँगा या किसी से भिजवा दुँगा। उस समय गोरेगाँव की बस रात के समय भरी रहती थी किंतु जोगेश्वरी की तरफ जानेवाली बस बिल्कुल खाली ही रहती थी तो मैं बस पर चढा और मध्य मे बाईं तरफ की खिडकी की सीट पर बैठ गया। मेरे पास उस समय Nokia 3310 मोबाईल फोन था और अक्सर मैं रेडियो पर 92.7 Big FM Channel का एक Yaadon ka IdiotBox with Neelesh Misra शो सुननता था जो की एक Award-Winning Radio Show था।


 

           मेरी जिंदगी मे कभी कोई लड़की तो नहीं आई लेकिन इस 92.7 Big FM Channel के Award-Winning Radio Show Yaadon ka IdiotBox with Neelesh Misra के काल्पनिक "याद शहर" और उसके काल्पनिक कहानियों और उसके किरदेरों मे मैं खुद के उस अधुरे प्रेम के पन्नों को पढ़ पाता था। यह शो सोमवार शनिवार के बीच रात को १० बजे आता तो मैं हफ्ते मे २-३ बार तो सुन ही लेता और रविवार को दिन मे १२ से ४ बजे के बीच आता पर रविवार को सुनने का मौका कम ही मिल पाता था। तो मैं भी कान मे Headphone डालकर अपने Nokia 3310 Mobile पर याद शहर की एक कहानी की यादों मे खो गया। हालाँकी मैं पूरा सुन पात उस से पहले जोगेश्वरी स्टेशन आ गया और मैं बस से उतरा और स्टेशन के आस-पास फिर एक चाय की टपरी ढुँढने लगा ताकी मैं रेडियो पर पूरी कहानी सुन सकुँ। कोई भी "याद शहर" की कहानी जब भी सुनता तो सुननेवाला इस शो की कहानी में ऐसा खो जाता की सब कुछ भूल जाता और अपने आप को इस कहानी के पात्र में जीने लगता। मेरा भी हाल कुछ ऐसा ही था, मैं ये भूल चूका था की मैंने अपने भाईंदर के कुछ मित्रो को आज मिलाने के लिए बोलै था। कहानी बडी ही दिलचस्प थी लेकिन भाईंदर भी जल्दी पहुँचना था और मैंने तो कुछ दोस्तो को Messages करके मिलने के लिए बोल भी दिया था, तो मैने बेमन से FM बंद किया और स्टेशन के भितर चला गया। वैसे भी चलते वक्त FM मे Disturbance की वजह से Signal बार-बार छूट रहा था और कहानी सुनने का मजा किरकिरा हो कहा था और ऊपर से Signal को पकडने के चक्कर मे जदेदोजहज करनी पड रही थी जिससे देरी भी हो रही थी। इसलिए मैंने रेडियो बंद किया और M-Indicator देखा तो २ बोरिवली ट्रेन के बाद नालासोपारा की एक ट्रेन आनेवाली थी। मुझे आज फिर जोर की पेशाब लगी और मेरी ट्रेन को लगभग १५ से २० मिनट लगनेवाला था तो मैंने सोचा क्युँ ना पेशाब कर ही लिया जाएँ। पिछली घटना मैं भ्रम मानकर भूल ही चुका था तो मै बिना किसी भय के एकदम शून्य भाव से पिलेटफार्म नंबर २-३ की तरफ उसी ब्रिज से होते हुए शौचालय गया। चुँकी इस बार ज्यादा रात नहीं थी तो प्लेटफार्म २-३ अधिक सूनसान सा नहीं लग रहा था। मेरे पिछे कुछ और लोग भी पेंशाब के लिए शौचालय चल पडे और हम सब लगभग साथ मे अंदर गये और साथ मे छणों की अंतराल पर बाहर निकले। हम कुल ७  लोग रहे होंगे और मैने पेशाब सबसे पहले ही शुरू की थी।  इस बार मैंने काफी समय से पेशाब तो नहीं रोकी थी किंतु फिर भी पेट तो फूला ही था किंतु मुझे पिछली बात याद आई और मैं ये सोचकर पेशाब जोर से करने लगा की मैं बाकी सब लोगो के साथ ही बाहर निकलकर प्ल्टफार्म नंबर १ पर चला जाऊँगा। मुझ से पहले ३ व्यक्ती बाहर निकल चुके थे किंतु मैं थोडी तसल्ली इस बात की कर रहा था की बाकी के ४ व्यक्ति पिछली कतार मे थे और उन लोगों ने अभी पेशाब करना शुरू ही किया था तो सोचा मैं कम से कम आखिर मे तो नहीं ही आऊँगा। जब उनमे से भी २ लोग और जाने लगे तब हडबडाहट मे मैं जल्दी-जल्दी बेमन से बिना तस्सली के पेशाब कर बाहर निकल आया और लोगों के साथ ब्रिज पर चढकर प्ल्टफार्म नंबर १ पर उतर गया।



           पूरे प्लेटफार्म नंबर २-३ से लेकर ब्रिज तक के रास्ते पर मैं मुड-मुडकर पिछे यह देखता रहा की शौचालय मे कोई और नया व्यक्ती तो नही प्रवेश कर रहा और ब्रिज पर से भी मैंने जहाँ तक हो सके पूरे प्लेटफार्म पर नजरे दौडाई और इस बात को सुनिश्चीत कर लिया था की शौचालय मे अब केवल दो ही व्यक्ती शेष है जो बाहर आयेंगे। मैं वही प्लेटफार्म नंबर १ पर पहुँचकर खडे होकर शौचालय की तरफ देखने लदा। मै ये तो नहीं बता सकता की शौचालय मे कुल कितने लोग थे हाँ लेकिन जब से मैंने गौर किया तब से लोगो की संख्या पक्का-पक्का बता सकता हुँ। मुझ से पहले  व्यक्ती निकले जो अधिक से अधिक अब तक ट्रेन पकड कर निकल लिए होंगे, मेरे साथ २ लोग निकले मतलब पिछे लोग ही शेष बचे और जिनको शौचालय से निकलते समय भी मैंने गौर करके पूरी तरह पक्का किया था। मैं और मेरे साथ के दो लोग अब प्लेटफार्म नंबर १ पर ट्रेन के प्रतीक्षा मे खडे थे। इस बीच शौचालय से बाहर बचे हुए दोनों व्यक्ती भी निकले और सीढियों की तरफ बढने लगे। अचानक मैं ये क्या देखता हुँ की शौचालय मे से एक तीसरा व्यक्ती भी बाहर निकलता है और वो कोई और नहीं बल्कि वहीं २-३ महिने पहले दिखाई दिया संदिग्ध व्यक्ती ही था। वो संदिग्ध व्यक्ती पिछली बार की तरह ही बाकी के दोनों व्यक्तीयों के पिछे-पिछे सिढियों पर चढा और सीढियों पर तने पतरे की चादर की दिवार के पिछे एक सीरे मे समा गया। छण भर के अंतराल पर दोनों व्यक्ती तो साढि के दुसरे छोर से पतरे की चादर के दिवार के ओट से निकले व ब्रिज से होते हुए सिढियां उतरकर मेरी तरफ वाले प्लेटफार्म पर आ गये। किंतु उस संदिग्ध व्यक्ती का कोई पता न था। इस बार भी वो पिछली बार की भाँती सीढियों के एक सिरे मे जाते हुए तो दिखा किंतु सीढियों के दुसरे सिरे से दुसरे व्यक्तियों के साथ बाहर नही आया। मेरी हिम्मत ब्रिज पर चढकर ये जाँचने की नही थी की वो संदिग्ध व्यक्ती कहाँ गायब हुआ, किन्तु मैं जिज्ञासावश वहीं प्लेटफार्म पर बैठ गया और मैंने नालासोपारा की ट्रेन तो छोडी ही किंतु बाद की कई ट्रेने केवल उस व्यक्ती को देखने, जानने, समझने के लिए छोडी। मैंने जिन-जिन मित्रों को Message करके भाईंदर बुलाया था उन सभी मित्रों को फोन कर बता दिया की मेरी प्रतिक्षा ना करें क्योंकी मुझे आने मे देर हो जाएँगी और उनमे से एक मित्र से फोन पर बाते कर के ये सोचकर टाईम पास करने लगा की शायद ये मेरा भ्रम हो और वो संदिग्ध व्यक्ती कोई आदमी ही निकले और मुझे दिखे। जब काफी देर हो गई और संदिग्ध व्यक्ती को मानों सीढियाँ निगल गई हो तो मैं भी ट्रेन पकडकर घर आ गया। सारे रास्ते मेरे दिमाग मे कैसे, क्युँ, किसलिए ये सारे सवाल घुमते रहे। फिर घर पहुँचकर मैंने अपने ऊपर गंगाजल छिडका और खाना खा कर सो गया। अगले दिन छुट्टी तो थी ही तो मैंने चाय की टपरी पर अपने कुछ दोस्तों से सारी घटना बताई किंतु लोगों का क्या जब आप कोई भूत-प्रेतों या ऐसा ही कोई अपना अनुभव बताओं तो लोग अपनी कहानी चेंप देते हैं तो मेरे साथ भी यही हुआ। जब मैंने अपनी कहानी बताई तो लोगों ने भी फेंकनी शुरू की और उसी फेंकम-फाक मे जिन अनुभवियों से मैं मेरी कहानी का निष्कर्ष चाहता था वो धरी की धरी रह गई। खैर मुझे इस बात का पूरा यकीन हो चुका था की वो कोई अतृप्त आत्मा या कोई प्रेत-योनी मे फँसा मनुष्य ही था। आप भी अपनी राय कमेंट मे अवश्य दें व कहानी पसंद आने पर शेयर जरूर करें। कहानी पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद ! 



भाग १ पड़ने के लिए यहाँ पर Click करे https://vikasbounthiyal.blogspot.com/2018/11/blog-post_18.html

भाग २ पड़ने के लिए यहाँ पर Click करे https://vikasbounthiyal.blogspot.com/2018/11/blog-post_21.html

Writer :- Vikas Bounthiyal
Source of article :- The Great Ayurveda 
Source of images :- NA
Length of the article :- 1085 Words (Calculated by wordcounter.net)


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